Chapter - 21 Summary
गोंडल में अक्षरब्रह्म गुणातीतानंद स्वामी की देरी के ऊपर शास्त्रीजी महाराज मंदिर का निर्माण करवा रहे थे। योगीजी महाराज को अक्षर देरी की सेवा करना बहुत प्रिय था। एक रात जब वे सो रहे थे, तब एक विषैला काला नाग आया और उनके बाएँ हाथ की उंगली में डँस लिया। इससे उन्हें तीव्र पीड़ा होने लगी, पर वे “स्वामिनारायण” नाम का जप करते रहे और बेहोश हो गए।
संत विभिन्न उपाय करने की बात कर रहे थे, लेकिन शास्त्रीजी महाराज ने आदेश दिया कि उन्हें अक्षर देरी में लिटाकर “स्वामिनारायण” नाम की धुन की जाए। संतों ने वैसा ही किया। लगभग बारह घंटे तक धुन चलने के बाद साँप का विष उतर गया और योगीजी महाराज को होश आ गया। उन्होंने शास्त्रीजी महाराज को प्रणाम किया। इस घटना को देखकर सरकारी डॉक्टर, गोंडल के महाराजा और अधिकारी अक्षर देरी के प्रभाव से आश्चर्यचकित हो गए।
Chapter - 21 Last-Minute Revision Points
गोंडल में अक्षर देरी पर मंदिर निर्माण
योगीजी महाराज की सेवा
मध्यरात्रि में काले नाग का डँसना
बाएँ हाथ की उंगली में सर्पदंश
“स्वामिनारायण” नाम का जप
शास्त्रीजी महाराज का आदेश
अक्षर देरी में धुन
12 घंटे में विष उतर गया
डॉक्टर और महाराजा आश्चर्यचकित
Chapter - 22 Summary
संवत 1990 में गोंडल के अक्षर मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ। वैशाख सुद दशमी के दिन शास्त्रीजी महाराज ने शास्त्रोक्त विधि से मूर्ति प्रतिष्ठा की। उसके बाद भव्य सभा में हजारों भक्तों की उपस्थिति में योगीजी महाराज को गोंडल अक्षर मंदिर का महंत बनाया और उनके गले में महंताई का हार पहनाया।
योगीजी महाराज को अक्षर मंदिर और अक्षर देरी अत्यंत प्रिय थे। वे सुबह बहुत जल्दी उठकर देरी की सफाई करते, चरणारविंद की पूजा, आरती, कथा और महापूजा करते। वे मंदिर का हिसाब भी लिखते, ठाकोरजी की सेवा करते और आने वाले भक्तों की सेवा करते। वे किसी भी भक्त को भोजन कराए बिना जाने नहीं देते थे।
एक दिन दाजीबापु उन्हें खोजते हुए रसोईघर पहुँचे, जहाँ योगीजी महाराज अकेले भोजन बना रहे थे। पूछने पर उन्होंने कहा कि भंडारी साधु बीमार हैं इसलिए उन्हें यह सेवा करने का अवसर मिला है और वे इससे बहुत प्रसन्न हैं। बाद में पता चला कि भंडारी साधु बीमार नहीं थे बल्कि आलस्य कर रहे थे। यह जानकर दाजीबापु ने साधुओं को डांटा और उन्हें सेवा में लगा दिया।
Chapter - 22 Last-Minute Revision Points
संवत 1990 — गोंडल अक्षर मंदिर पूर्ण
वैशाख सुद दशमी — मूर्ति प्रतिष्ठा
योगीजी महाराज महंत बने
अक्षर देरी की सेवा प्रिय
सुबह पूजा, आरती और कथा
महापूजा और धुन
मंदिर का हिसाब और सेवा
भक्तों को भोजन कराना
योगीजी महाराज रसोई में सेवा
दाजीबापु ने साधुओं को डांटा
Chapter - 23 Summary
योगीजी महाराज अत्यंत तपस्वी जीवन जीते थे। वे प्रतिदिन केवल एक बार भोजन करते और हर तीसरे दिन निर्जल उपवास रखते थे। उपवास के बावजूद वे गर्मी में शास्त्रीजी महाराज के साथ गाँव-गाँव घूमकर सेवा करते थे। इस निरंतर परिश्रम के कारण उन्हें सारणगांठ की बीमारी हो गई। संवत 1993 में राजकोट में अंग्रेज डॉक्टर एस्पिनोल को दिखाया गया, जिन्होंने ऑपरेशन करने की सलाह दी। शास्त्रीजी महाराज की आज्ञा से उन्हें राजकोट अस्पताल में भर्ती किया गया।
ऑपरेशन के दिन शास्त्रीजी महाराज गोंडल से राजकोट आए। जब योगीजी महाराज को ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था, तब उन्होंने अपने गुरु को देखकर आनंद से प्रणाम किया। डॉक्टर ने सफलतापूर्वक ऑपरेशन किया। कुछ समय बाद जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने सबसे पहले शास्त्रीजी महाराज को देखा और पूछा, “क्या शास्त्रीजी महाराज को दूध पिलाया गया?”
यह सुनकर सभी भक्त और डॉक्टर आश्चर्यचकित रह गए। बेहोशी से जागते ही अपने गुरु की सेवा की चिंता करना उनकी अद्भुत गुरु भक्ति और एकता का प्रमाण था।
Chapter - 23 Last-Minute Revision Points
योगीजी महाराज का तपस्वी जीवन
दिन में एक बार भोजन
हर तीसरे दिन निर्जल उपवास
शास्त्रीजी महाराज की सेवा
सारणगांठ रोग
संवत 1993 — राजकोट अस्पताल
डॉक्टर एस्पिनोल द्वारा ऑपरेशन
ऑपरेशन से पहले गुरु को प्रणाम
होश आते ही पूछा — “दूध पिलाया?”
अद्भुत गुरु भक्ति
Chapter - 24 Summary
संवत 2007 में शास्त्रीजी महाराज ने बीमारी स्वीकार की और कहा कि गढ़ड़ा की मूर्तियों की प्रतिष्ठा अब योगीजी महाराज करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि उनके और योगीजी महाराज के बीच कोई भेद नहीं है और “मैं ही योगी हूँ और योगी ही मैं हूँ।” वैशाख सुद चौथ के दिन वे अंतर्धान हो गए और अगले दिन उनका अंतिम संस्कार किया गया। भक्त अत्यंत शोक में डूब गए, पर योगीजी महाराज ने उन्हें समझाया कि शास्त्रीजी महाराज सदैव सत्संग में प्रकट हैं।
योगीजी महाराज के इन शब्दों से सभी को विश्वास हुआ कि जो श्रीजी महाराज शास्त्रीजी महाराज के माध्यम से प्रकट थे, वही अब योगीजी महाराज में प्रकट हैं। शास्त्रीजी महाराज के अक्षरधाम गमन के छठे दिन गढ़ड़ा में योगीजी महाराज की उपस्थिति में मूर्ति प्रतिष्ठा का भव्य समारोह हुआ जिसमें लगभग पचास हजार भक्त उपस्थित थे। इस घटना से सभी को विश्वास हो गया कि शास्त्रीजी महाराज सत्संग में सदैव प्रकट हैं और योगीजी महाराज के महान कार्य का प्रारंभ हुआ।
Chapter - 24 Last-Minute Revision Points
संवत 2007 — शास्त्रीजी महाराज की बीमारी
अंतिम शब्द — “मैं ही योगी, योगी ही मैं”
वैशाख सुद चौथ — अंतर्धान
भक्तों में शोक
योगीजी महाराज का धैर्य
“शास्त्रीजी महाराज सदैव प्रकट”
गढ़ड़ा में मूर्ति प्रतिष्ठा
पचास हजार भक्त उपस्थित
विरोधियों की आशंका समाप्त
योगीजी महाराज का कार्य प्रारंभ
Chapter - 25 Summary
योगीजी महाराज ने साप्ताहिक सत्संग सभा की परंपरा पहले से शुरू की थी, पर शास्त्रीजी महाराज के अंतर्धान के बाद उन्होंने इस कार्य को और अधिक गति दी। धीरे-धीरे युवकों के मंडल बनाना शुरू किया गया। प्रारंभ में बहुत कम युवक आते थे और कई बार निराश हो जाते थे, लेकिन योगीजी महाराज उन्हें प्रेरित करते और आज्ञा पालन में सुख है यह समझाते। वे नए युवकों को जोड़ने, कथा-वार्ता करने और सत्संग का ज्ञान फैलाने की प्रेरणा देते थे।
योगीजी महाराज गाँव और शहरों में जाकर युवक मंडल स्थापित करते, उनकी सूची रखते और उन्हें पत्र लिखकर उत्साह देते। कुछ ही समय में भारत में सैकड़ों युवक मंडल स्थापित हो गए। बच्चों को सत्संग का ज्ञान देने के लिए बाल मंडल भी शुरू किए गए। वे सत्संग सभा के महत्व को बताते और कहते कि सभा में श्रीजी महाराज, गुणातीतानंद स्वामी और शास्त्रीजी महाराज दिव्य रूप से उपस्थित रहते हैं।
योगीजी महाराज युवकों की सभी गतिविधियों में रुचि लेते थे—प्रवचन, योगासन, भजन, कीर्तन, संवाद और रास आदि। वे उन्हें ध्यान से सुनते और आशीर्वाद देते। युवकों द्वारा तैयार किए गए हस्तलिखित अंक भी पढ़ते और हर तीन महीने में उन्हें प्रकाशित करने की प्रेरणा देते थे।
Chapter - 25 Last-Minute Revision Points
साप्ताहिक सत्संग सभा
शास्त्रीजी महाराज के बाद विस्तार
युवक मंडलों की स्थापना
प्रारंभ में कम युवक
योगीजी महाराज का प्रोत्साहन
गाँव और शहरों में युवक मंडल
भारत में सैकड़ों युवक मंडल
बच्चों के लिए बाल मंडल
सत्संग सभा का महत्व
युवकों की गतिविधियों में रुचि



