परिचय – प्रागजी भक्त – प्रकरण 26 से 29 का सारांश

 Chapter - 26 Summary

संवत 1952 में जलझीलणी के उत्सव पर भगतजी को गढ़पुर बुलाने की व्यवस्था यज्ञपुरुषदासजी ने आचार्य महाराज की अनुमति से की। इस अवसर पर अनेक भक्त गढ़ड़ा में एकत्र हुए। भगतजी आचार्य महाराज और बड़े सद्गुरुओं के आसनों पर, लक्ष्मीवाड़ी में और मंदिर में जाकर संतों और भक्तों को दर्शन देते थे।

जब आचार्य महाराज ने भगवान के सुख के बारे में पूछा, तब भगतजी ने समझाया कि जिसे भगवान के सुख का अनुभव होता है उसकी इन्द्रियाँ और अंतःकरण शांत हो जाते हैं और उसका मन भगवान की मूर्ति के अलावा कहीं और आसक्त नहीं होता। यह सुख गुरुमुख बनने पर ही अनुभव होता है।

भगतजी ने समझाया कि एकांतिक संत में आत्मबुद्धि रखना ही कल्याण का महान साधन है। ऐसे संत की मन, कर्म और वचन से सेवा करने से एकांतिक धर्म सिद्ध होता है और उनका विरोध नहीं करना चाहिए। भगवान को पाने के लिए इन्द्रियों और अंतःकरण को जीतना आवश्यक है और काम-क्रोध जैसे दोषों के सामने वीर बनना चाहिए।

यज्ञपुरुषदासजी के अध्ययन के विषय में भगतजी ने कहा कि यदि व्यवस्था हो तो राजकोट में पढ़ें, काशी जाने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि महिमा सहित भक्ति ही स्थिर रहती है, महिमा के बिना भक्ति अंत में नष्ट हो जाती है। इस प्रकार भगतजी ने दिव्य कथाओं से सभी को आनंद दिया और बाद में महुवा पधारे।


Chapter - 26 Last-Minute Revision Points

  • संवत 1952 – जलझीलणी उत्सव

  • यज्ञपुरुषदासजी द्वारा भगतजी को बुलाना

  • भक्तों को दर्शन

  • भगवान के सुख का वर्णन

  • इन्द्रियाँ और अंतःकरण शांत

  • एकांतिक संत में आत्मबुद्धि

  • इन्द्रियों को जीतना

  • काम-क्रोध पर विजय

  • यज्ञपुरुषदासजी के अध्ययन की आज्ञा

  • महिमा सहित भक्ति




Chapter - 27 Summary
संवत 1953 में यज्ञपुरुषदासजी ने विचार किया कि जहाँ पहले भगतजी का अपमान हुआ था, वहीं उनका भव्य सम्मान होना चाहिए। इसलिए जन्माष्टमी के अवसर पर उन्हें जूनागढ़ बुलाने के लिए आचार्य महाराज से अनुमति ली गई। जब भगतजी जूनागढ़ पहुँचे, तो स्टेशन से ही आचार्य महाराज के साथ उनका भव्य स्वागत हुआ और मंदिर में उनके रहने की उत्तम व्यवस्था की गई।

उत्सव के दिनों में भगतजी प्रतिदिन सभा में जाकर कथा-वार्ता करते और संतों तथा भक्तों को आध्यात्मिक आनंद देते। कई संत उन्हें दंडवत करते, क्योंकि वे गुणातीतानंद स्वामी के परम कृपापात्र शिष्य थे। भगतजी ने समझाया कि एकांतिक संत में आत्मबुद्धि रखना और महिमा सहित भक्ति करना ही कल्याण का मार्ग है।

उन्होंने बताया कि भक्ति ही जीवन का मुख्य तत्व है। वैराग्य, ज्ञान और धर्म होने पर भी यदि भक्ति न हो तो सब व्यर्थ है। उन्होंने इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने, विषयों से दूर रहने और सच्चे गुरु के महिम को पहचानने की शिक्षा दी। जगा स्वामी भी भगतजी के महिम की बातें करते और भक्तों को उनके संग का महत्व समझाते।

इस प्रकार भगतजी ने जूनागढ़ में भक्तों को ब्रह्मरूप बनकर भगवान से जुड़ने की शिक्षा दी। उत्सव के बाद उन्होंने आचार्य महाराज और संतों से विदा ली और जगा स्वामी से भावपूर्ण मिलन के बाद गोंडल चले गए।


Chapter - 27 Last-Minute Revision Points

  • संवत 1953 – जन्माष्टमी उत्सव

  • यज्ञपुरुषदासजी का निमंत्रण

  • जूनागढ़ में भव्य स्वागत

  • सभा में कथा-वार्ता

  • संतों द्वारा दंडवत

  • एकांतिक संत में आत्मबुद्धि

  • महिमा सहित भक्ति

  • भक्ति का महत्व

  • गुरु का महिम

  • अंत में गोंडल प्रस्थान



Chapter - 28 Summary
गोंडल में यज्ञपुरुषदासजी ने अध्ययन के विषय में पूछा तो भगतजी ने कहा कि उन्हें शास्त्रविद्या और ब्रह्मविद्या दोनों सिखा दी गई हैं, अब कुछ भी अधूरा नहीं है। उन्होंने यज्ञपुरुषदासजी को सबका गुरु स्थापित किया और संतों व भक्तों को सुखी करने की आज्ञा दी।

महुा पहुँचकर भगतजी ने रोग स्वीकार किया और अंतिम दर्शन के लिए भक्तों को बुलाया। उन्होंने अन्न त्याग दिया और उनकी स्थिति दिन-प्रतिदिन गंभीर होती गई, फिर भी वे भक्तों को धीरज देते रहे। अन्नकूट के दिन मंदिर में दर्शन करने आए और कहा कि जिन लोगों ने उनके दर्शन किए हैं, उन्हें वे अक्षरधाम ले जाएंगे।

संवत 1954 कार्तिक सुद 13 के दिन भगतजी समाधि में स्थित होकर अक्षरधाम पधार गए। भक्त अत्यंत दुखी हो गए और उनके पंचभौतिक शरीर का अंतिम संस्कार मालण नदी के किनारे किया गया।

यह समाचार सुनकर यज्ञपुरुषदासजी अत्यंत दुखी हुए, पर भगतजी ने उन्हें दर्शन देकर कहा, “मैं कहाँ गया हूँ? मैं तो तुममें सदा प्रकट हूँ।” इस दर्शन से उनका शोक दूर हो गया और सभी को समझ में आया कि महाराज यज्ञपुरुषदासजी जैसे परमहंस संत में प्रकट हैं।


Chapter - 28 Last-Minute Revision Points

  • यज्ञपुरुषदासजी को गुरु बनाना

  • संतों को सुखी करने की आज्ञा

  • महुवा में अंतिम अवस्था

  • अन्न त्याग

  • अन्नकूट पर दर्शन

  • अक्षरधाम ले जाने का वचन

  • कार्तिक सुद 13 – अक्षरधाम गमन

  • मालण नदी के किनारे अंतिम संस्कार

  • यज्ञपुरुषदासजी का दुःख

  • भगतजी का दर्शन और सांत्वना



Chapter - 29 Summary
संवत 1914 में भगतजी महुवा के भक्तों के साथ जूनागढ़ स्वामी के दर्शन के लिए जा रहे थे। रास्ते में शेत्रुंजी नदी में बाढ़ आई हुई थी, पर भगतजी ने भगवान में विश्वास रखकर भक्तों को साहस दिया और सभी सुरक्षित नदी पार कर गए। रास्ते में एक भक्त को कुत्ते ने काट लिया, पर भगतजी के स्पर्श से उसकी पीड़ा कम हो गई। आगे उनके भाई नरसिंहभाई को काले नाग ने डस लिया, लेकिन स्वामिनारायण मंत्र और प्रार्थना से उनकी पीड़ा भी शांत हो गई।

एक अन्य प्रसंग में भारी वर्षा और अंधकार के कारण मार्ग दिखाई नहीं दे रहा था। भगतजी ने भक्तों को भजन करने को कहा और थोड़ी देर बाद सभी ने देखा कि वे गढ़ड़ा पहुँच चुके हैं। एक बार कंजी दरजी को भगतजी से प्राप्त प्रसादी के हार के प्रभाव से भगवान और स्वामी की मूर्ति निरंतर दिखाई देती रही।

महुा में कॉलरा फैलने पर भगतजी ने लोगों को हनुमानजी को तेल चढ़ाने की आज्ञा दी और कई रोगियों को राहत मिली। एक ब्राह्मण ने भगतजी की आँखों में श्रीजी महाराज के दर्शन किए। अपनी अंतिम बीमारी के समय भी भगतजी अन्नकूट के दिन मंदिर गए और हजारों भक्तों को दर्शन दिए। बाद में उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने उनके दर्शन किए हैं उनका कल्याण हो गया है।


Chapter - 29 Last-Minute Revision Points

  • संवत 1914 – शेत्रुंजी नदी पार

  • भगवान में विश्वास

  • कुत्ते के काटने से पीड़ा दूर

  • नरसिंहभाई को नागदंश

  • भजन से गढ़ड़ा पहुँचना

  • कंजी दरजी को दिव्य दर्शन

  • कॉलरा के समय हनुमानजी को तेल

  • ब्राह्मण को श्रीजी महाराज के दर्शन

  • अंतिम बीमारी में अन्नकूट दर्शन

  • “दर्शन करने वालों का कल्याण”

0 comments

દિવસ-2 - પ્રવેશ પરીક્ષા

કિશોર સત્સંગ પ્રવેશ 1 ✅ એક વાક્યમાં જવાબ મનુષ્ય અને પશુમાં શું મુખ્ય ભેદ જણાવ્યો છે? શિક્ષાપત્રીને કઈ રીતે વર્ણવવામાં આવી છે? શિક્ષાપત્રીનું...