Chapter - 1 Summary
सद्गुरु गोपालानंद स्वामी महान योगमूर्ति संत थे। श्रीजी महाराज ने उनकी विशिष्टता स्वीकार की थी। संवत 1837 में टोडला गाँव में खुशाल भट्ट के रूप में जन्म हुआ। बाल्यकाल से ही वे संस्कृत, वेद-वेदांत और शास्त्रों में निपुण तथा योग-तप में पारंगत थे। श्यामलाजी मूर्ति के चमत्कार और राजा से कर माफी के प्रसंग से उनकी दिव्य शक्ति प्रकट हुई। स्वामिनारायण भगवान का महिमा सुनकर वे उनके आश्रित बने। ब्राह्मण वेश में स्वयं भगवान उन्हें लाने आए थे। संवत 1864 कार्तिक वद 8 को दादाखाचर दरबार में उन्हें दीक्षा देकर “गोपालानंद स्वामी” नाम दिया गया।
श्रीजी महाराज की आज्ञा से गोपालानंद स्वामी वडोदरा में रहकर सत्संग का प्रचार करते थे और विद्वानों तथा सैयाजीराव गायकवाड़ को भी आश्रित बनाया। यज्ञ में आहुति देकर यज्ञनारायण के दर्शन कराए तथा ग्रहण का प्रसंग भक्ति हेतु रोक दिया। सारंगपुर में हनुमानजी की मूर्ति स्थापित कर सेवा सरल की। उनके ज्ञान से अनेक भक्त दृढ़ निष्ठावान बने। मानभा को समाधि देकर श्रीजी महाराज के दर्शन कराए। श्रीजी महाराज ने उन्हें मंदिरों की जिम्मेदारी सौंपी और गुणातीतानंद स्वामी का महिमा रखने की आज्ञा दी। वे तिरस्कार सहकर भी त्याग और क्षमा में अडिग रहे।
गोपालानंद स्वामी करुणामूर्ति थे। उन्होंने हमीर भक्त को प्रायश्चित्त देकर पुनः सत्संग में स्थान दिलाया। अपने मुख्य संतों को गुणातीतानंद स्वामी के सान्निध्य में भेजा। श्रीजी महाराज के सर्वोपरी स्वरूप का प्रचार किया और विरोध के बीच भी अडिग रहे। “अब दृष्टि अक्षरधाम में” कहकर संवत 1908 वैशाख वद 4 को योगबल से देह त्याग किया। उन्होंने वचनामृत का संपादन तथा शास्त्रीय भाष्य रचकर अक्षरपुरुषोत्तम उपासना को वैदिक आधार दिया। शास्त्रीजी महाराज ने उनकी मूर्तियाँ प्रतिष्ठित कर सम्मान दिया।
Last-Minute Revision Points
संवत 1837 जन्म (खुशाल भट्ट)
वेद-वेदांत और योग निपुण
श्यामलाजी चमत्कार
कर माफी प्रसंग
श्रीजी महाराज के आश्रित
भगवान ब्राह्मण वेश में
संवत 1864 दीक्षा
नाम: गोपालानंद स्वामी
वडोदरा में प्रचार
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यज्ञनारायण दर्शन
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ग्रहण रोका
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हनुमानजी प्रकट
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मानभा समाधि
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मंदिर जिम्मेदारी
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गुणातीतानंद महिमा
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त्याग और क्षमा
हमीर को प्रायश्चित्त
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संतों को जूनागढ़ भेजा
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सर्वोपरी श्रीजी महाराज
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विरोध में अडिग
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अक्षरधाम दृष्टि
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संवत 1908 देहत्याग
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वचनामृत संपादन
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शास्त्रीय आधार
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मूर्ति प्रतिष्ठा


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