प्रवेश - शास्त्रीजी महाराज - – प्रकरण 26 से 30 का सारांश

 Chapter - 26 Summary

चैत्र सुद पूर्णिमा के उत्सव से पहले स्वामीश्री ने भविष्यवाणी की कि वर्ताल में उनके विरोध में सभा बुलाई जाएगी, पर अंत में वे लोग आपस में ही झगड़ेंगे और उनके विरुद्ध कुछ नहीं होगा। स्वामीश्री की आज्ञा से कालिदासभाई और अन्य भक्त वर्ताल गए। स्वामीश्री ने गलभाई से पूछा कि क्या वे सभा में “अक्षरपुरुषोत्तम महाराज की जय” बोलाने का साहस कर सकते हैं। गलभाई ने साहसपूर्वक यह आज्ञा स्वीकार की।

पूर्णिमा की सभा में जैसे ही आचार्य महाराज आए, गलभाई ने पहले “सहजानंद स्वामी महाराज की जय” और फिर “अक्षरपुरुषोत्तम महाराज की जय” का जयघोष किया। सभी ने अनजाने में इसे दोहरा दिया। बाद में लोगों को समझ आया कि क्या हुआ है, लेकिन गलभाई के प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण कोई विरोध न कर सका। सभा बिना चर्चा के समाप्त हो गई और लोगों में आपसी चर्चा होने लगी।

बाद की सभा में शास्त्री यज्ञपुरुषदासजी के विरुद्ध बात की गई, तब कालिदासभाई ने उनके महान कार्यों का उल्लेख कर उनका समर्थन किया। कोठारी गोरधनभाई ने भी कहा कि शास्त्री शुद्ध हैं। अंत में विरोधियों में आपसी विवाद हो गया और स्वामीश्री की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई।


Chapter - 26 Last-Minute Revision Points

  • चैत्र पूर्णिमा — वर्ताल उत्सव

  • स्वामीश्री की भविष्यवाणी

  • गलभाई को आज्ञा

  • “सहजानंद स्वामी महाराज की जय”

  • “अक्षरपुरुषोत्तम महाराज की जय”

  • सबने अनजाने में स्वीकार किया

  • सभा समाप्त

  • कालिदासभाई का समर्थन

  • कोठारी गोरधनभाई का कथन

  • विरोधियों में आपसी विवाद


Chapter - 27 Summary
वर्ताल में स्वामीश्री ने वचनामृत की कथा जारी रखी, जिसके लिए पूरे गुजरात से भक्त आने लगे। वर्ताल के कई साधु और कोठारी गोरधनभाई भी उनकी कथाएँ सुनने आते थे। जब किसी ने गोरधनभाई से पूछा कि वे शास्त्री यज्ञपुरुषदासजी के साथ क्यों रहते हैं, तब उन्होंने उत्तर दिया कि वर्ताल के दो हजार साधुओं में उन्होंने शास्त्रीजी जैसा धन और स्त्री से त्यागी संत नहीं देखा और उनकी बातें उन्हें बहुत मधुर लगती हैं।

स्वामीश्री के आसन के पास हमेशा भक्त रहते थे, इसलिए कोई उन्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकता था। भक्त प्रेम से उनकी सेवा करते और भोजन की व्यवस्था करते थे। इससे विरोधियों के मन में और अधिक असंतोष उत्पन्न हुआ। आचार्य लक्ष्मीप्रसाद छोटे थे, और स्वामीश्री ने उन्हें अच्छा आचरण रखने की सलाह दी, जो उन्हें पसंद नहीं आई।

विरोधियों ने स्वामीश्री की कथा में बाधा डालने के लिए कई उपाय किए। वे सभा के सामने मिर्च की धूनी करते या पानी गिरा देते ताकि सभा भंग हो जाए। फिर भी स्वामीश्री और भक्त दृढ़ रहे और सत्संग चलता रहा।


Chapter - 27 Last-Minute Revision Points

  • वर्ताल में वचनामृत कथा

  • गुजरात से भक्तों का आगमन

  • कोठारी गोरधनभाई का समर्थन

  • शास्त्रीजी का त्याग और महिमा

  • भक्तों की सेवा

  • विरोधियों का असंतोष

  • आचार्य लक्ष्मीप्रसाद को उपदेश

  • कथा में बाधा डालने की योजना

  • मिर्च की धूनी और पानी डालना

  • फिर भी सत्संग जारी



Chapter - 28 Summary
वर्ताल में स्वामीश्री के प्रति तीव्र विरोध था। भक्तों को लगा कि ऐसी परिस्थिति में स्वामीश्री का वर्ताल में रहना सुरक्षित नहीं है, क्योंकि कुछ द्वेषी साधु कोई अनिष्ट कर सकते हैं। इसलिए संवत 1962 की कार्तिकी पूर्णिमा के अवसर पर स्वामीश्री के भक्त वर्ताल आए और वे उनसे एक क्षण के लिए भी अलग नहीं होते थे।

भक्तों ने स्वामीश्री से भंडारे में भोजन करने न जाने की विनती की, परंतु स्वामीश्री ने कहा कि साधु को सदैव भंडारे में ही भोजन करना चाहिए। जब खिचड़ी परोसी गई तो उसमें विष की तीव्र गंध थी। स्वामीश्री ने यह समझ लिया, फिर भी प्रसाद का अनादर न हो इसलिए थोड़ा भोजन किया। बाहर आने के बाद उन्हें अस्वस्थता हुई, पर उन्होंने भक्तों को चिंता न करने के लिए कहा।

विरोधियों ने योजना बनाई कि जब शास्त्री यज्ञपुरुषदासजी भंडारे में आएँगे तो उन्हें धक्का देकर बड़े चूल्हे में फेंक देंगे। लेकिन भक्त उनके साथ खड़े रहे और वहाँ से हटे नहीं। जब विरोधियों ने भक्तों को धक्का देना शुरू किया, तब कुछ भक्तों ने अवसर पाकर भंडारे में जाकर स्वामीश्री को उठाकर बाहर निकाल लिया। बाद में विरोधियों को पता चला कि स्वामीश्री तो पहले ही निकल चुके हैं।


Chapter - 28 Last-Minute Revision Points

  • वर्ताल में स्वामीश्री के प्रति विरोध

  • भक्तों ने उनकी रक्षा के लिए वर्ताल पहुँचना

  • भंडारे में न जाने की विनती

  • खिचड़ी में विष की गंध

  • स्वामीश्री ने प्रसाद का मान रखा

  • बाहर आने पर अस्वस्थता

  • विरोधियों की नई योजना

  • भक्तों की दृढ़ता

  • स्वामीश्री को बाहर निकालना

  • योजना असफल



Chapter - 29 Summary
स्वामीश्री के प्रति बढ़ते विरोध को देखकर भक्त चिंतित हो गए और उन्होंने विचार किया कि अब क्या करना चाहिए। उन्होंने निश्चय किया कि रुदेल मंदिर को पूरा करने के लिए स्वामीश्री के मंडल की मांग की जाए। वे कोठारी गोरधनभाई के पास गए और उनके कहने पर आचार्य महाराज के पास गए, परंतु कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला।

भक्तों को लगा कि स्वामीश्री का वर्ताल में रहना उचित नहीं है, पर स्वामीश्री अडिग रहे और बोले कि शरीर नष्ट हो जाए तो भी वर्ताल का द्वार नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि भगतजी महाराज ने उन्हें ऐसा आदेश दिया था। बाद में श्रीकृष्णजी अदा आए और शिक्षापत्री के अनुसार देशकाल के अनुसार आचरण करने की सलाह दी। तब स्वामीश्री ने इसे भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया।

समारोह के बाद भक्तों ने आचार्य महाराज से स्वामीश्री के मंडल को बोचासन भेजने की विनती की। पर आचार्य लक्ष्मीप्रसादजी ने कहा कि जहाँ जाना हो वहाँ जाएँ। यह सुनकर भक्त दुखी हुए। अंत में स्वामीश्री ने कहा कि हम मंदिर और सत्संग से अलग नहीं होंगे, पर यदि महाराज की इच्छा होगी तो बाहर निकलना पड़ेगा। फिर उन्होंने पुरुषोत्तमदास स्वामी को वहाँ रुकने की आज्ञा दी।


Chapter - 29 Last-Minute Revision Points

  • स्वामीश्री के प्रति विरोध

  • भक्तों की चिंता और विचार

  • रुदेल मंदिर के लिए मंडल की मांग

  • कोठारी गोरधनभाई और आचार्य से चर्चा

  • स्वामीश्री का दृढ़ निश्चय

  • भगतजी महाराज की आज्ञा

  • श्रीकृष्णजी अदा की सलाह

  • देशकाल अनुसार आचरण

  • आचार्य लक्ष्मीप्रसादजी का उत्तर

  • मंदिर और सत्संग से अलग न होने का संकल्प



Chapter - 30 Summary
स्वामीश्री जानते थे कि वर्ताल में उत्पन्न हुए ये कठिन परिस्थितियाँ श्रीजी महाराज की इच्छा से ही हुई हैं, क्योंकि उन्होंने अक्षरपुरुषोत्तम की शुद्ध उपासना का प्रचार किया था। उन्हें अपने लिए कोई दुख नहीं था, पर उन्हें इस बात का दुख था कि श्रीजी महाराज के पवित्र स्थान में भी उनकी शुद्ध उपासना की बात नहीं की जा सकती थी।

स्वामीश्री पाँच संतों के साथ हरिकृष्ण महाराज की मूर्ति के सामने प्रार्थना कर भगवान की इच्छा मानकर वर्ताल से बाहर निकलने लगे। वे पाँच संतों और लगभग डेढ़ सौ भक्तों के साथ हनुमान द्वार से बाहर निकले। रास्ते में पुलिस पटेल किशोरभाई मिले और उन्होंने स्वामीश्री को कष्ट देने वालों को जेल में डालने की बात कही, पर स्वामीश्री ने कहा कि साधु का धर्म अपमान सहकर भी सत्संग कराना है।

बहुत से भक्त हार लेकर उनसे मिलने आए और विदाई दी। स्वामीश्री ने सभी से कहा कि वर्ताल में ठाकोरजी की सेवा और धर्मादो पहले की तरह जारी रखें, क्योंकि मंदिर और ठाकोरजी हमारे ही हैं। इसके बाद स्वामीश्री करमसद होते हुए बोचासन पहुँचे। उनके साथ पाँच वीर संत थे जिन्होंने अनेक कष्ट सहन किए, पर कभी शिकायत या विवाद नहीं किया। ऐसे संतों के साथ से स्वामीश्री के कार्य को और गति मिली।


Chapter - 30 Last-Minute Revision Points

  • अक्षरपुरुषोत्तम उपासना के कारण विरोध

  • स्वामीश्री का दुख – उपासना की चर्चा न होना

  • हरिकृष्ण महाराज के सामने प्रार्थना

  • पाँच संत और लगभग 150 भक्त

  • हनुमान द्वार से प्रस्थान

  • किशोरभाई पुलिस पटेल से मुलाकात

  • साधु धर्म – अपमान सहना

  • भक्तों की विदाई

  • वर्ताल में सेवा जारी रखने का संदेश

  • करमसद से बोचासन प्रस्थान

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