वचनामृत मौखिक प्रश्न और उत्तर - 1 - Solution
जय 10वीं कक्षा में पढ़ता था। बोर्ड की परीक्षा निकट थी। उसे गणित विषय से डर लगता था। उसके मित्र ने कहा कि, “यदि तुम यह धागा हाथ में बाँधोगे तो परीक्षा में अच्छे अंक आएँगे।” जय ने वह धागा बाँध लिया और अब उसे लगने लगा कि इसी से अच्छा परिणाम आएगा।
प्रश्न : जय किस वचनामृत के आधार पर विचार करे तो उसे सही बात समझ में आए?
ग.म.३८ - सांसारिक जीव को यदि कोई धन देने वाला या पुत्र देने वाला मिल जाए तो उसमें तुरंत श्रद्धा हो जाती है, परंतु भगवान के भक्त को कभी भी यंत्र-मंत्र में श्रद्धा नहीं होती। और जो हरिभक्त यंत्र-मंत्र में श्रद्धा रखता है, वह सत्संगी होते हुए भी आधा विमुख समझना।
मीना बहन सत्संग की सेवाओं में जुड़ी हुई थीं। एक प्रसंग में उन्हें रसोई की सामान्य सेवा दी गई। उन्हें लगा, “मुझे तो कोई बड़ी जिम्मेदारी मिलनी चाहिए थी।”
प्रश्न : मीना बहन किस वचनामृत के आधार पर विचार करें तो उन्हें सही बात समझ में आए?
ग.प्र.५८ - पक्का हरिभक्त बनने का उपाय यही है कि परमेश्वर के दास का भी दास बनकर रहे और ऐसा माने कि, ‘सभी भक्त बड़े हैं और मैं सबसे छोटा हूँ।’ इस प्रकार समझकर हरिभक्तों का दासानुदास बनकर रहे।
जय और मितेश एक ही कक्षा में पढ़ते थे। मितेश हमेशा अच्छे अंक लाता था और शिक्षक भी उसकी प्रशंसा करते थे। यह देखकर जय को उससे ईर्ष्या होने लगी। अब जय उसकी प्रशंसा करने के बजाय उसकी कमियाँ खोजने लगा।
प्रश्न : जय किस वचनामृत के आधार पर विचार करे तो उसे सही बात समझ में आए?
ग.प्र.४ - जिस व्यक्ति से ईर्ष्या हो, उसके गुणों को ग्रहण करना और अपने अवगुणों का त्याग करना। और यदि ऐसा न हो सके तथा ईर्ष्या के कारण भगवान के भक्तों का द्रोह हो, तो ऐसी ईर्ष्या का भगवान के भक्त को हर प्रकार से त्याग करना चाहिए।
जय बोर्ड की परीक्षा दे रहा था। परीक्षा में कम अंक आने पर उसने कहा, “मेरे मित्र मुझे घूमने के लिए बुलाते थे, इसलिए मैं पढ़ाई नहीं कर सका, नहीं तो मेरे अच्छे अंक आते।”
प्रश्न : जय किस वचनामृत के आधार पर विचार करे तो उसे सही बात समझ में आए?
ग.अं.६ - जीव का ऐसा स्वभाव है कि जब उसमें कोई दोष आता है, तब वह कहता है, ‘मुझसे किसी और ने गलती करवाई, मुझमें कोई दोष नहीं है।’ पर ऐसा कहने वाला महामूर्ख है। यदि कोई कहे कि ‘कुएँ में गिर जाओ’, तो क्या उसके कहने से कुएँ में गिर जाना चाहिए? इसलिए दोष उसी का है जो ऐसा करता है; दूसरों पर दोष डालना मूर्खता है।
जय बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहा था। प्रारंभ में वह नियमित पूजा और पढ़ाई करता था। फिर धीरे-धीरे मोबाइल में रील्स, गेम और वेब सीरीज़ देखने लगा। अब उसका मन पढ़ाई और भजन में नहीं लगता था।
प्रश्न : जय किस वचनामृत के आधार पर विचार करे तो उसे सही बात समझ में आए?
ग.प्र.१८ - जीव पाँच इन्द्रियों द्वारा जो आहार ग्रहण करता है, यदि वह शुद्ध होगा तो अंतःकरण शुद्ध होगा, और अंतःकरण शुद्ध होगा तो भगवान की अखंड स्मृति रहेगी। यदि पाँच इन्द्रियों में से किसी एक का आहार भी अशुद्ध हो जाए, तो अंतःकरण भी अशुद्ध हो जाता है।
महेशभाई के कार्यालय में उनके मित्र ने नई कार खरीदी। अन्य सहकर्मी भी महँगी वस्तुएँ खरीद रहे थे। अब महेशभाई को लगने लगा कि “मुझे भी यह सब चाहिए।” इसलिए वे निरंतर इन्हीं विचारों में रहने लगे।
प्रश्न : महेशभाई किस वचनामृत के आधार पर विचार करें तो उन्हें सही बात समझ में आए?
ग.म.५५ - जैसे काबर के बालों में अच्छा और बुरा सब एक समान होते हैं, वैसे ही मायिक पदार्थ भी सभी समान हैं।
जय नियमित युवक सभा में जाता था। उसके साथ जाने वाला मितेश कभी-कभी देर से आता था और कुछ नियमों में भी कमजोर था। यह देखकर जय उसके अवगुण देखने लगा और सोचने लगा कि “ऐसा व्यक्ति सत्संग में क्यों आता है?”
प्रश्न : जय किस वचनामृत के आधार पर विचार करे तो उसे सही बात समझ में आए?
ग.प्र.२४ - जब किसी हरिभक्त का दोष दिखाई दे, तब ऐसा समझना चाहिए कि ‘उसका स्वभाव भले ही सत्संग के योग्य न हो, फिर भी उसे सत्संग मिला है, तो उसके पूर्वजन्म या इस जन्म के संस्कार बहुत श्रेष्ठ होंगे।’ इस प्रकार उसके गुणों का पक्ष लेना चाहिए।
हितेशभाई व्यापार करते थे। उन्हें ग्राहकों से कठोर भाषा में बात करने की आदत थी। अनेक ग्राहक दूर होने लगे, फिर भी वे अपना स्वभाव नहीं बदलते थे।
प्रश्न : हितेशभाई किस वचनामृत के आधार पर विचार करें तो उन्हें सही बात समझ में आए?
ग.प्र.१६ - जिसे सत्-असत् का विवेक हो, वह अपने अवगुणों को पहचानकर उनका त्याग कर देता है और अच्छे विचारों को ग्रहण करता है।
महेशभाई कार्यालय में काम करते थे। वे अपने कार्य में ध्यान देते थे, परंतु बाद में कार्यालय की एक महिला कर्मचारी से आवश्यक कार्य के अतिरिक्त अधिक बातचीत और समय बिताने लगे। धीरे-धीरे उनके नियम और आध्यात्मिकता पर प्रभाव पड़ने लगा।
प्रश्न : महेशभाई किस वचनामृत के आधार पर विचार करें तो उन्हें सही बात समझ में आए?
ग.म.३५ - यह कहना कि ‘मन अच्छा हो तो कहीं भी रह सकते हैं’, गलत है। कितना भी ज्ञानी व्यक्ति हो, यदि वह स्त्री-संग में रहने लगे तो उसका धर्म नहीं टिकता। इसी प्रकार स्त्री का पुरुष-संग भी उसके धर्म को नष्ट कर देता है।
मीना बहन नियमित घरसभा करती थीं। कुछ दिनों बाद उन्हें लगा, “आज नहीं करेंगे तो भी चलेगा।” धीरे-धीरे घरसभा बंद हो गई और घर में झगड़े तथा तनाव बढ़ने लगे।
प्रश्न : मीना बहन किस वचनामृत के आधार पर विचार करें तो उन्हें सही बात समझ में आए?
ग.प्र.३४ - जब मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा छोड़कर टेढ़े-मेढ़े मार्ग पर चलता है, तब दुःख पाता है। और जब आज्ञा में रहता है, तब भगवान के आनंद को प्राप्त करता है।
जय नियमित युवक सभा में जाता था। एक दिन उसे सभा में चप्पल व्यवस्थित करने की सेवा मिली। प्रारंभ में उसने सेवा की, परंतु बाद में मित्र उसकी प्रशंसा करने लगे, इसलिए अब वह केवल वही सेवा करना चाहता था जिसमें लोग उसकी प्रशंसा करें।
प्रश्न : जय किस वचनामृत के आधार पर विचार करे तो उसे सही बात समझ में आए?
ग.म.४१ - जिसे परमेश्वर का भजन करना हो, उसे भगवान या भगवान के भक्त की सेवा मिल जाए तो उसे अपना बड़ा सौभाग्य समझना चाहिए। सेवा भगवान की प्रसन्नता और अपने कल्याण के लिए करनी चाहिए, न कि प्रशंसा पाने के लिए।
जय नियमित युवक सभा में जाता था। एक दिन संत ने किसी दूसरे युवक को सेवा के लिए बुलाया और उसकी प्रशंसा की। यह देखकर जय सोचने लगा, “संत उन्हें अधिक महत्व देते हैं, मेरी ओर तो ध्यान ही नहीं देते।” तब से वह मन में अणगम रखता था।
प्रश्न : जय किस वचनामृत के आधार पर विचार करे तो उसे सही बात समझ में आए?
लोया-१८ - जब भगवान और संतों के प्रति दिव्यभाव नहीं रहता, तब व्यक्ति बार-बार गुण-अवगुण देखने लगता है और सोचता है कि ‘इनका पक्ष लिया जाता है, हमारा नहीं।’ इस प्रकार अंत में वह विमुख हो जाता है।
मीना बहन को दिनभर सीरियल और सोशल मीडिया देखने की आदत पड़ गई थी। धीरे-धीरे उनका भजन, पाठ और घरसभा में मन कम लगने लगा।
प्रश्न : मीना बहन किस वचनामृत के आधार पर विचार करें तो उन्हें सही बात समझ में आए?
ग.प्र.१८ - यदि पाँच इन्द्रियों का आहार शुद्ध होगा तो अंतःकरण शुद्ध होगा, और यदि इन्द्रियों का आहार अशुद्ध होगा तो अंतःकरण भी अशुद्ध हो जाएगा।
विजयभाई की दुकान में कुछ समय से ग्राहक कम आने लगे थे। एक मित्र ने कहा, “यह विशेष वस्तु दुकान में रख दो, तो व्यापार बढ़ जाएगा।” विजयभाई वह वस्तु लाकर दुकान में रख देते हैं।
प्रश्न : विजयभाई किस वचनामृत के आधार पर विचार करें तो उन्हें सही बात समझ में आए?
ग.म.३८ - सांसारिक जीव को यदि कोई धन या पुत्र देने वाला मिल जाए तो उसमें तुरंत श्रद्धा हो जाती है, परंतु भगवान के भक्त को कभी भी यंत्र-मंत्र में श्रद्धा नहीं होती। और जो हरिभक्त यंत्र-मंत्र में श्रद्धा रखता है, वह सत्संगी होते हुए भी आधा विमुख समझना।


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