योगीजी महाराज प्रारम्भ 11-15

 Chapter-11

राजकोट में कुछ समय रहने के बाद सद्गुरु कृष्णचरणदास स्वामी संत मंडल के साथ गाँवों में भ्रमण पर निकले और सरधार के पास हजडियाला गाँव पहुँचे। वहाँ मंदिर न होने के कारण संतों ने चौराहे पर ठहराव किया। दोपहर में कथा के बाद संत विश्राम करने लगे। उसी समय ज्योतिष और सामुद्रिक शास्त्र के जानकार एक गरासिया हरिभक्त ने झीणा भगत के पैरों में अद्भुत ऊर्ध्व रेखा देखी और उनके महान सद्गुरु बनने की भविष्यवाणी की। झीणा भगत ने विनम्रता से स्वयं को सेवक बताया। यह बात कृष्णचरणदास स्वामी को बताई गई, जिन्होंने हँसते हुए कहा कि झीणा भगत में महान बनने के लक्षण हैं।

Minute Revision Points

  • कृष्णचरणदास स्वामी का गाँवों में भ्रमण

  • हजडियाला गाँव में मंदिर का अभाव

  • कथा के बाद संतों का विश्राम

  • गरासिया हरिभक्त द्वारा ऊर्ध्व रेखा का दर्शन

  • झीणा भगत के महान बनने की भविष्यवाणी

  • झीणा भगत की विनम्रता

  • स्वामी का समर्थन

Chapter-12 

मेंगणी और लोधिका गाँव में अन्नकूट उत्सव के अवसर पर झीणा भगत की तपस्या और त्याग प्रकट होता है। लोधिका में साटा और जलेबी की भव्य रसोई होने पर भी झीणा भगत ने उपवास रखा और भोजन नहीं किया। दरबार साहेब और सद्गुरु कृष्णचरणदास स्वामी के आग्रह के बावजूद उन्होंने भोजन त्यागा। उनकी तपस्या और त्याग देखकर सद्गुरु प्रसन्न हुए और उन्हें आशीर्वाद देकर अन्य संतों को उनके जैसा तपस्वी बनने का उपदेश दिया।

Minute Revision Points

  • मेंगणी और लोधिका में अन्नकूट उत्सव

  • सद्गुरु कृष्णचरणदास स्वामी

  • साटा–जलेबी की रसोई

  • झीणा भगत का उपवास

  • दरबार और स्वामी का आग्रह

  • तपस्या और त्याग

  • सद्गुरु का आशीर्वाद

                                              Chapter-13

संवत 1967 में झीणा भगत को वडताल में त्यागी की दीक्षा दी गई और उनका नाम “ज्ञानजीवनदासजी” रखा गया, जिन्हें योगीजी महाराज कहा जाता था। बाद में वे शास्त्रीजी महाराज की सेवा में जुड़कर अक्षरपुरुषोत्तम उपासना के प्रसार में लगे। संवत 1969 के आसो सुद एकादशी के दिन कृष्णजी अदा के अंतिम समय में उन्होंने योगीजी महाराज को बुलाकर सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। इस भावपूर्ण क्षण में कृष्णजी अदा “जय स्वामिनारायण” कहकर अक्षरधाम पधारे।

Minute Revision Points

  • संवत 1967: त्यागी दीक्षा

  • नाम: ज्ञानजीवनदासजी (योगीजी महाराज)

  • शास्त्रीजी महाराज की सेवा

  • अक्षरपुरुषोत्तम उपासना का प्रसार

  • संवत 1969 आसो सुद एकादशी

  • कृष्णजी अदा का आशीर्वाद

  • अक्षरधाम प्रस्थान

                                              Chapter-14

योगीजी महाराज पूर्णतः निःस्पृह और वैरागी संत थे। वे सदा कथा, कीर्तन, मुखपाठ और सेवा में मग्न रहते थे। भावनगर में महाराजा के विवाह की भव्य शोभायात्रा होने पर भी उन्होंने उसे देखने की इच्छा नहीं की और त्यागभाव प्रकट किया। गुरु के डाँट को उन्होंने सुधार का साधन माना और विनम्रता से सहन किया। उनकी साधुता और सहनशीलता से अनेक भक्त प्रभावित हुए।

Last-Minute Revision Points

  • योगीजी महाराज निःस्पृह और वैरागी

  • कथा, कीर्तन, मुखपाठ, सेवा में लीन

  • विवाह की शोभायात्रा से उदासीनता

  • त्याग की दृढ़ भावना

  • गुरु के डाँट को कल्याणकारी माना

  • सहनशीलता और विनम्रता

  • भक्तों पर गहरा प्रभाव

                                             Chapter-15
  • योगीजी महाराज शास्त्रीजी महाराज के मंडल के साधु के रूप में जाने जाते थे। केरिया गाँव में मंदिर में ठहरने के दौरान उपवास के समय कुछ द्वेषी साधुओं ने मंदिर में घुसकर अपमान किया और मारपीट की। योगीजी महाराज और अन्य संतों ने कोई प्रतिकार नहीं किया और हँसते हुए सब सहन किया। गाँव के हरिभक्तों ने आकर स्थिति शांत की। यह घटना मान-अपमान में समभाव और सहनशीलता की शिक्षा देती है।

    Last-Minute Revision Points

    • योगीजी महाराज शास्त्रीजी महाराज के मंडल के साधु

    • केरिया गाँव में मंदिर ठहराव

    • उपवास के समय हमला

    • अपमान और मारपीट

    • संतों की शांति और सहनशीलता

    • हरिभक्तों द्वारा स्थिति नियंत्रण

    • मान-अपमान में समभाव

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