प्रवेश – शास्त्रीजी महाराज – प्रकरण 36 से 40 का सारांश

 Chapter - 36 Summary

बोचासन में मंदिर बनने के बाद स्वामीश्री ने सारंगपुर में मंदिर बनाने का संकल्प किया। हरिभक्तों के आग्रह से वे वहाँ गए और मंदिर की जगह दिखाकर कहा कि यह श्रीजी महाराज का संकल्प है।

उन्होंने मोतीभाई को मंदिर के लिए कीर्तन बनाने को कहा। प्रारंभ में साधनों की कमी के कारण मोतीभाई को शंका हुई।

परंतु स्वामीश्री की कृपा से उन्हें तीन शिखरों वाला भव्य मंदिर, सोने के कलश और मूर्तियों का दिव्य दर्शन हुआ। उनकी शंका दूर हो गई और उन्होंने कीर्तन बनाना शुरू किया।

इससे स्वामीश्री की दिव्य शक्ति और महान कार्य करने की क्षमता प्रकट होती है।


Chapter - 36 Last-Minute Revision Points

• सारंगपुर मंदिर का संकल्प
• भक्तों के आग्रह से आगमन
• मंदिर की जगह दिखाना
• मोतीभाई को कीर्तन कहना
• प्रारंभिक शंका
• तीन शिखर का दिव्य दर्शन
• सोने के कलश और मूर्तियाँ
• शंका दूर
• स्वामीश्री की दिव्य शक्ति

Chapter - 37 Summary

जब स्वामीश्री राजकोट पधारे, तब झीणा भक्त को उनके दर्शन की तीव्र इच्छा थी। प्रथम दर्शन में ही उन्हें स्वामीश्री के प्रति गहरा प्रेम हो गया।

बाद में स्वामीश्री सारंगपुर आए और मंदिर बनाने का संकल्प किया। उन्होंने कमरे खरीदे और दीवान झवेरभाई की मदद से भूमि प्राप्त की।

मंदिर निर्माण में धन की कमी, लोगों की कमी और विरोध जैसी अनेक कठिनाइयाँ आईं, फिर भी संत और भक्त अडिग रहे।

वे कठिन परिस्थितियों में भी आनंद से सेवा करते रहे और भिक्षा लेकर जीवन यापन किया।

बाद में ज्ञानजीवनदास स्वामी और अन्य संत भी जुड़ गए और मंदिर कार्य आगे बढ़ाया।


Chapter - 37 Last-Minute Revision Points

• राजकोट में झीणा भक्त का दर्शन
• प्रथम दर्शन में प्रेम
• सारंगपुर मंदिर का संकल्प
• कमरे खरीदे
• दीवान से भूमि प्राप्त
• विरोध और कठिनाइयाँ
• संत अडिग रहे
• भिक्षा से जीवन
• अक्षर-पुरुषोत्तम में निष्ठा
• ज्ञानजीवनदास स्वामी जुड़े

Chapter - 38 Summary

स्वामीश्री जब नडियाद गए, तब दोलतरामभाई ने उन्हें अपने घर आमंत्रित किया। वे स्वामीश्री का बहुत सम्मान करते थे और अक्षर-पुरुषोत्तम उपासना को समझना चाहते थे।

स्वामीश्री ने वचनामृत गढड़ा मध्य 21 के आधार पर भगवान और भक्त का महिमा समझाया और बताया कि प्रकट भगवान और संत का निश्चय ही कल्याण का मार्ग है।

दोलतरामभाई बहुत प्रभावित हुए और समझ गए कि गुणातीतानंद स्वामी मूल अक्षर हैं तथा स्वामीश्री द्वारा शुद्ध उपासना प्रकट हुई है। उन्होंने स्वामीश्री की महत्ता स्वीकार की और भविष्य में उनकी महिमा बढ़ने की बात कही।

बाद में वडोदरा में स्वामीश्री का पहला फोटो लिया गया, परंतु उन्होंने उसे सार्वजनिक न करने की आज्ञा दी।


Chapter - 38 Last-Minute Revision Points

• नडियाद में दोलतरामभाई से मिलन
• अक्षर-पुरुषोत्तम समझने की इच्छा
• वचनामृत गढड़ा 21 का महत्व
• भगवान-भक्त का महिमा
• प्रकट निश्चय = कल्याण
• दोलतरामभाई प्रभावित
• गुणातीतानंद स्वामी = अक्षर
• शुद्ध उपासना प्रकट
• स्वामीश्री की महत्ता स्वीकार
• वडोदरा में पहला फोटो (प्रकाशित न करें)

Chapter - 39 Summary

सारंगपुर मंदिर के कार्य को रोकने के लिए विरोधियों ने अनेक प्रयास किए, परंतु कार्य चलता रहा। मूर्ति प्रतिष्ठा के समय विरोधियों ने लिमडी के ठाकोर साहेब को गलत जानकारी देकर कार्य रोकने का प्रयास किया।

ठाकोर साहेब स्वामीश्री से मिले और चर्चा की। भक्तों ने स्वामीश्री की शक्ति के बारे में बताया।

मूर्तियों के विषय में पूछने पर स्वामीश्री ने निर्भयता से कहा कि उन्होंने जो कष्ट सहन किए हैं वे सहजानंद स्वामी और गुणातीतानंद स्वामी के लिए हैं, इसलिए मुख्य मंदिर में उन्हीं की मूर्तियाँ स्थापित होंगी और राधा-कृष्ण की मूर्तियाँ अलग खंड में रहेंगी।

यह सुनकर ठाकोर साहेब ने अपना आग्रह छोड़ दिया और स्वामीश्री के निर्णय को स्वीकार किया। इस प्रकार विरोधियों का प्रयास विफल हो गया।


Chapter - 39 Last-Minute Revision Points

• सारंगपुर मंदिर का विरोध
• प्रतिष्ठा रोकने का प्रयास
• ठाकोर साहेब को भ्रमित किया
• स्वामीश्री से मुलाकात
• स्वामीश्री की शक्ति का अनुभव
• मूर्ति विषयक प्रश्न
• निर्भय उत्तर
• मुख्य मूर्ति: स्वामिनारायण व गुणातीतानंद
• राधा-कृष्ण अलग स्थान
• ठाकोर साहेब ने स्वीकार किया
• विरोध विफल हुआ

Chapter - 40 Summary

सारंगपुर मंदिर का कार्य उत्साहपूर्वक चल रहा था और संतों व भक्तों ने तन-मन से सेवा की। बालमुकुंद स्वामी ने उनकी सेवा की प्रशंसा की और कहा कि यह अक्षर के मुक्तों के बल से हो रहा है।

मंदिर तैयार हुआ और संवत १९७२ वैशाख सुद ६ को प्रतिष्ठा तय हुई। शीरों कम बनने के बावजूद स्वामीश्री ने विश्वास दिलाया कि कुछ कमी नहीं होगी।

यज्ञ के बाद स्वामीश्री के हाथों मूर्ति प्रतिष्ठा हुई। भोजन के समय अव्यवस्था हुई, परंतु स्वामीश्री ने व्यवस्था की और चमत्कारिक रूप से हजारों लोगों को भोजन मिला और शीरों समाप्त नहीं हुआ।

इस घटना से सभी प्रभावित हुए। बाद में मोजीदड़ में स्वामीश्री ने विनम्रता दिखाते हुए कहा कि साधु को भव्य स्वागत शोभा नहीं देता।


Chapter - 40 Last-Minute Revision Points

• संतों की सेवा
• बालमुकुंद स्वामी की प्रशंसा
• अक्षर मुक्तों का बल
• मंदिर पूर्ण
• प्रतिष्ठा तिथि
• शीरों कम
• स्वामीश्री का विश्वास
• यज्ञ व प्रतिष्ठा
• भोजन में अव्यवस्था
• स्वामीश्री की व्यवस्था
• हजारों को भोजन
• शीरों समाप्त नहीं हुआ
• चमत्कार
• मोजीदड़ प्रसंग
• साधु की विनम्रता


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