वचनामृत मौखिक प्रश्नोत्तर - 2 -Solution

 

१. किशन कॉलेज में पढ़ता था। शुरुआत में वह अपनी कक्षा के सभी विद्यार्थियों से सामान्य रूप से बात करता था। कुछ समय बाद उसकी एक युवती मित्र के साथ बहुत अधिक निकटता बढ़ गई। अब दोनों घंटों तक फोन पर बात करते, लगातार संदेश भेजते और अधिकांश समय साथ ही बिताते थे। शुरुआत में किशन को यह सब सामान्य लगता था, लेकिन धीरे-धीरे उसके परिवार और मित्रों ने ध्यान दिलाया कि वह पहले की तरह पढ़ाई, सभा और अन्य जिम्मेदारियों पर ध्यान नहीं दे पा रहा है। फिर भी किशन को लगता था कि इसमें कोई गलत बात नहीं है।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में किशन को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.म.३५

ग.म.३५ : जगत में ऐसी कहावत है कि, ‘मन होय चंगा तो कठरोट में गंगा,’ वह कहावत गलत है। कोई कितना भी समाधिनिष्ठ या विचारवान क्यों न हो, यदि वह स्त्रियों के प्रसंग में रहने लगे तो उसका धर्म किसी प्रकार टिक नहीं सकता। और कोई स्त्री कितनी भी धर्मनिष्ठ क्यों न हो, यदि उसे पुरुष का सहवास मिले तो उसका धर्म भी नहीं रह सकता। इस प्रकार स्त्री-पुरुष का परस्पर सहवास हो और फिर भी उनका धर्म बना रहे, ऐसी आशा कभी नहीं रखनी चाहिए। यह बात बिल्कुल सत्य है, इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं रखना चाहिए।


२. राहुल रोज की तरह अपनी नौकरी से घर लौट रहा था। रास्ते में अचानक एक वाहन से टकराने के कारण उसका दुर्घटना हो गया। उसके हाथ और पैर में गंभीर चोटें आईं। डॉक्टर ने उसे कई सप्ताह तक आराम करने की सलाह दी। अब वह अपनी नौकरी पर नहीं जा सकता था और दैनिक कार्यों के लिए भी उसे परिवार की सहायता लेनी पड़ती थी। शुरुआत में सभी ने उसका हौसला बढ़ाया, लेकिन समय बीतने के साथ उसके मन में चिंता बढ़ने लगी। वह सोचने लगा कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? मेरा आगे का जीवन कैसे चलेगा? इन विचारों के कारण वह बहुत निराश रहने लगा।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में राहुल को धैर्य और मानसिक शांति कैसे मिल सकती है?

उत्तर : ग.म.६२

ग.म.६२ : भगवान का जो भक्त होता है, उसे जो-जो प्रकार के दुःख आते हैं, उनके देने वाले काल, कर्म या माया नहीं होते; बल्कि स्वयं भगवान ही अपने भक्त की धैर्य-शक्ति को देखने के लिए दुःख भेजते हैं। फिर जैसे कोई व्यक्ति पर्दे के पीछे रहकर देखता है, वैसे ही भगवान भक्त के हृदय में रहकर उसकी धैर्य-शक्ति को देखते रहते हैं। काल, कर्म और माया में इतनी शक्ति ही कहाँ है कि वे भगवान के भक्त को दुःख दे सकें? यह सब भगवान की ही इच्छा है, ऐसा जानकर भगवान के भक्त को प्रसन्न रहना चाहिए।


३. आरव १२वीं कक्षा में पढ़ता था। एक दिन उसके माता-पिता ने उसकी एक गलती के लिए उसे समझाया। आरव को यह बात बहुत बुरी लगी। गुस्से में उसने परिवार से बात करना बंद कर दिया। जब भोजन का समय हुआ तो उसने खाना खाने से भी मना कर दिया। उसकी माँ ने बहुत समझाया, लेकिन वह अपने कमरे में जाकर सो गया। अगले दिन भी उसका मन शांत नहीं हुआ। वह सोचता था कि यदि मैं खाना नहीं खाऊँगा तो सबको मेरी भावना समझ आएगी। लेकिन समय बीतने के साथ उसकी चिड़चिड़ाहट, दुःख और बेचैनी और बढ़ती गई।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में आरव को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : सारं.१८

सारं.१८ : मूर्ख व्यक्ति जब उलझन में पड़ता है, तब या तो सो जाता है, या रोता है, या किसी से झगड़ता है, या उपवास करता है। इन चार प्रकारों से वह अपनी उलझन दूर करने का प्रयास करता है। और यदि फिर भी अधिक उलझ जाए तो अंत में मर भी सकता है। इस प्रकार मूर्ख व्यक्ति शोक दूर करने का उपाय करता है। लेकिन ऐसा करने से न दुःख दूर होता है और न स्वभाव बदलता है। यदि समझदारी से उपाय करे तो दुःख और स्वभाव दोनों दूर हो जाते हैं। इसलिए समझदार व्यक्ति ही वास्तव में सुखी होता है।


४. रमेशभाई एक छोटी कंपनी में नौकरी करते थे। पिछले कुछ महीनों से घर का खर्च बढ़ गया था। बच्चों की पढ़ाई, घर का किराया और अन्य आवश्यक खर्चों में उनकी अधिकांश आय खर्च हो जाती थी। मंदिर में कोई विशेष उत्सव आता तो अन्य हरिभक्त बड़ी सेवा और सुंदर भेंट अर्पित करते थे। रमेशभाई की भी भगवान की सेवा करने की बहुत इच्छा थी, लेकिन अपनी आर्थिक स्थिति देखकर वे सोच में पड़ जाते थे। उन्हें लगता था कि उनके पास अर्पण करने के लिए कुछ विशेष नहीं है। इस विचार के कारण वे कभी-कभी निराश हो जाते थे।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में रमेशभाई को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.अं.२५

ग.अं.२५ : भगवान की प्रसन्नता केवल उसी पर होती है जो बहुत अधिक उपचार और वैभव से भक्ति करता है, और गरीब पर नहीं होती — ऐसा नहीं है। यदि कोई गरीब व्यक्ति श्रद्धा सहित जल, पत्र, फल या फूल भगवान को अर्पित करे, तो भगवान उससे भी प्रसन्न हो जाते हैं।


५. मीनाबेन कई वर्षों से नियमित सत्संग करती थीं। कुछ समय पहले उनके परिवार में एक बड़ी आर्थिक समस्या आई। उन्होंने बहुत प्रार्थना की और आशा रखी कि सब जल्दी ठीक हो जाएगा। लेकिन परिस्थिति उनकी अपेक्षा के अनुसार नहीं बदली। कठिनाइयाँ अभी भी बनी हुई थीं। अब उनके मन में प्रश्न उठने लगे। वे सोचने लगीं कि मैं इतने वर्षों से भक्ति कर रही हूँ, फिर भी मेरी समस्या क्यों दूर नहीं हो रही? इन विचारों के कारण उनकी श्रद्धा कमजोर होने लगी।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में मीनाबेन को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.प्र.७०

ग.प्र.७० : सत्संग अपने जीव के कल्याण के लिए करना चाहिए, किसी सांसारिक पदार्थ की इच्छा के लिए नहीं। जैसे यदि घर में दस व्यक्ति हों और उन दस में से एक ही बच जाए, तो क्या वह थोड़ी बात है? या जिसके हाथ में रामपातर आने वाला था और उसे रोटी खाने को मिल जाए, तो क्या वह कम है? जो सब नष्ट होने वाला था उसमें से जितना बच गया, उसे भी बहुत मानना चाहिए। इसी प्रकार यदि बहुत बड़ा दुःख आने वाला हो और परमेश्वर का आश्रय लेने से वह कुछ कम हो जाए, तो यह भी बहुत बड़ा लाभ है। लेकिन जीव को यह समझ में नहीं आता। यदि शूली का दुःख लिखा हो और वह काँटे से टल जाए, तो भी बहुत बड़ा अंतर पड़ जाता है।

६. अंकित एक शांत और अच्छे स्वभाव का युवक था। नए कॉलेज में प्रवेश लेने के बाद उसकी मित्रता कुछ ऐसे विद्यार्थियों से हुई जो हमेशा गपशप, मज़ाक, गलत चर्चाओं और नकारात्मक बातों में समय बिताते थे। शुरुआत में अंकित केवल उनके साथ बैठता था, लेकिन धीरे-धीरे उसे भी उनकी बातें अच्छी लगने लगीं। कुछ महीनों बाद उसने महसूस किया कि पहले जैसी मानसिक शांति अब नहीं रही। उसके भीतर नकारात्मक विचार, चिड़चिड़ापन और बेचैनी बढ़ने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके स्वभाव में इतना परिवर्तन क्यों आ गया है।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में अंकित को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.प्र.१८

ग.प्र.१८ : और पाँच इन्द्रियों के द्वारा जीव जो आहार ग्रहण करता है, यदि वह आहार शुद्ध होगा तो अन्तःकरण भी शुद्ध होगा। और अन्तःकरण शुद्ध होगा तो अखण्ड भगवान की स्मृति बनी रहेगी। यदि पाँच इन्द्रियों में से किसी एक इन्द्रिय का आहार भी मलिन हो जाए तो अन्तःकरण भी मलिन हो जाता है। इसलिए भगवान के भक्त को भगवान के भजन में जो भी विघ्न आता है, उसका कारण पाँच इन्द्रियों के विषय ही हैं, अन्तःकरण नहीं।


७. रोहित मंदिर की एक सेवा के दौरान नए हरिभक्त मनोजभाई के साथ काम कर रहा था। मनोजभाई का स्वभाव थोड़ा गुस्से वाला था। छोटी-छोटी बातों पर भी वे कभी-कभी ऊँची आवाज़ में बोल देते थे। एक दिन सेवा के दौरान उन्होंने रोहित से भी कठोर शब्दों में बात की। तब से रोहित के मन में उनके प्रति नाराज़गी बढ़ने लगी। अब वह सोचने लगा कि ऐसे स्वभाव का व्यक्ति सत्संग में कैसे हो सकता है?

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में रोहित को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.प्र.२४

ग.प्र.२४ : जब किसी हरिभक्त का दोष दिखाई दे, तब ऐसा समझना चाहिए कि, ‘इसका स्वभाव भले ही सत्संग के अनुकूल न हो, फिर भी इसे सत्संग मिला है और यह जैसा-तैसा होकर भी सत्संग में जुड़ा हुआ है, तो अवश्य इसके पूर्वजन्म या इस जन्म के संस्कार बहुत श्रेष्ठ होंगे, तभी इसे ऐसा सत्संग मिला है।’ ऐसा समझकर उसके गुणों का पक्ष लेना चाहिए।


८. हार्दिक नियमित रूप से सत्संग करता था। पिछले कुछ समय से उसके मन में कुछ गलतफहमियाँ उत्पन्न होने लगी थीं। उसे लगता था कि कुछ हरिभक्तों के साथ अधिक प्रेम से व्यवहार किया जाता है, जबकि उसकी ओर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। जब किसी सेवा या कार्यक्रम में उसे अपेक्षा के अनुसार अवसर नहीं मिलता, तो वह और अधिक दुःखी हो जाता। अब सभा में आने का उसका उत्साह भी कम होने लगा। उसके मन में विचार आने लगा कि शायद मुझे सत्संग से थोड़ा दूर हो जाना चाहिए।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में हार्दिक को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : लोया-१८

लोया-१८ : जब भगवान के विषय में दिव्यभाव नहीं समझता, तब बात-बात में धोखा खाता है और गुण-अवगुण लेने लगता है कि, ‘इनका पक्ष रखते हैं, हमारा नहीं रखते; इन्हें अधिक बुलाते हैं, हमें नहीं बुलाते; इन्हें अधिक प्रेम करते हैं, हमें नहीं करते।’ इस प्रकार गुण-अवगुण का विचार करता रहता है। इससे उसका अंतःकरण दिन-प्रतिदिन पीछे हटता जाता है और अंत में वह विमुख हो जाता है।


९. जय एक युवक था। जब भी कोई उसकी आलोचना करता या उसकी बात से असहमत होता, तो वह तुरंत प्रतिक्रिया दे देता। कई बार गुस्से में ऐसे शब्द बोल देता जिनका बाद में उसे पछतावा होता। सोशल मीडिया पर भी किसी पोस्ट को देखकर वह तुरंत उत्तर लिख देता, फिर उसे महसूस होता कि उसने जल्दबाज़ी में निर्णय लिया। इसके कारण उसके मित्रों और परिवार के साथ भी कई बार मतभेद उत्पन्न हो जाते थे।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में जय को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.प्र.१६

ग.प्र.१६ : “जिस भगवान के भक्त को सत्-असत का विवेक होता है, वह अपने भीतर जो-जो अवगुण हों उन्हें पहचानकर विचारपूर्वक उनका त्याग कर देता है। जो सही विचार हो उसे ग्रहण करता है और जो गलत विचार हो उसका त्याग कर देता है।”


१०. विवान कॉलेज में पढ़ता था। उसके कई मित्रों के पास महंगे मोबाइल, ब्रांडेड कपड़े और नवीनतम गैजेट्स थे। जब भी वह सोशल मीडिया पर कोई नई वस्तु देखता, तो उसे भी उसे पाने की इच्छा होती। कुछ महीने पहले उसने एक महंगा मोबाइल खरीदा था, लेकिन अब वह उसे साधारण लगने लगा। अब उसकी इच्छा किसी और नए मॉडल को खरीदने की होने लगी। धीरे-धीरे उसका ध्यान पढ़ाई, परिवार और सत्संग से अधिक नई चीज़ें पाने पर केंद्रित होने लगा।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में विवान को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.म.५५

ग.म.५५ : जैसे कबूतर के बच्चों में कौन अच्छा है और कौन बुरा, यह कहना कठिन है; सब एक ही प्रकार के होते हैं। उसी प्रकार मायिक पदार्थ भी सभी समान हैं।

११. राजेशभाई के एक निकट संबंधी का अचानक निधन हो गया। इस घटना के बाद वे बहुत विचलित हो गए। अब जब भी वे किसी बीमारी, दुर्घटना या मृत्यु का समाचार सुनते, तो उनके मन में भय उत्पन्न हो जाता। वे बार-बार सोचते कि यदि मेरे साथ कुछ हो गया तो क्या होगा? इन विचारों के कारण वे चिंतित रहने लगे। रात में भी उन्हें कई बार नींद नहीं आती थी। मृत्यु से जुड़े विचार उनके मन में लगातार आते रहते थे।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में राजेशभाई को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.अं.३९

ग.अं.३९ : अपने को देह से पृथक आत्मा जानना चाहिए। वह आत्मा न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न कणबी है, न किसी का पुत्र है, न किसी का पिता है। उसकी कोई जाति नहीं, कोई नाता नहीं। वह आत्मा सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी तथा ज्ञानयुक्त है।


१२. हार्दिक कॉलेज में पढ़ता था। एक दिन उसके WhatsApp पर एक संदेश आया। उसमें लिखा था, ‘इस संदेश को 21 लोगों को भेजो, तो 24 घंटे में शुभ समाचार मिलेगा। यदि नहीं भेजोगे तो नुकसान होगा।’ संदेश के साथ कुछ लोगों के अनुभव भी लिखे हुए थे। हार्दिक ने उसे पढ़ा और उसके मन में थोड़ा डर और संदेह उत्पन्न हुआ। उसके कुछ मित्रों ने तुरंत वह संदेश आगे भेज दिया। अब हार्दिक सोच में पड़ गया कि यह संदेश सच है या नहीं।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में हार्दिक को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.म.३८

ग.म.३८ : सांसारिक जीव को यदि कोई धन देने वाला या पुत्र देने वाला मिल जाए तो उस पर तुरंत विश्वास हो जाता है; परंतु भगवान के भक्त को किसी भी यंत्र-मंत्र में कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। और जो हरिभक्त होकर भी यंत्र-मंत्र में विश्वास करता है, उसे सत्संगी होते हुए भी आधा विमुख जानना चाहिए।


१३. ध्रुव मंदिर की विभिन्न सेवाओं में जुड़ा हुआ था। जब भी वह कोई सेवा करता, तो उसकी तस्वीरें और वीडियो तुरंत सोशल मीडिया पर साझा करता। धीरे-धीरे उसके मन में यह अपेक्षा बढ़ने लगी कि लोग उसकी पोस्ट को लाइक करें, उसकी प्रशंसा करें और उसकी सेवा के बारे में अच्छी टिप्पणियाँ करें। यदि उसे अधिक प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो उसे भीतर से निराशा होती। अब सेवा करते समय उसका ध्यान सेवा से अधिक इस बात पर रहने लगा कि लोग उसके बारे में क्या कहेंगे।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में ध्रुव को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.म.४१

ग.म.४१ : जिसे परमेश्वर का भजन करना हो, उसे यदि भगवान या भगवान के भक्त की सेवा करने का अवसर मिले तो उसे अपना बड़ा सौभाग्य मानकर सेवा करनी चाहिए। वह सेवा भी भगवान की प्रसन्नता और अपने कल्याण के लिए भक्ति-भाव से करनी चाहिए, किसी की प्रशंसा प्राप्त करने के लिए नहीं।


१४. हार्दिक और काव्या एक ही कार्यालय में काम करते थे। वे अक्सर साथ भोजन करते, बाहर जाते और घंटों बातें करते थे। जब कोई उनसे पूछता कि वे इतना समय साथ क्यों बिताते हैं, तो वे हमेशा कहते, ‘हम तो केवल मित्र हैं।’ समय के साथ उनकी निकटता और बढ़ती गई। अब वे एक-दूसरे के बिना कोई निर्णय भी नहीं लेते थे। हार्दिक के परिवार और कुछ सत्संगी मित्रों ने उसे सावधान रहने की सलाह दी, लेकिन उसे लगता था कि वे गलत सोच रहे हैं।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में हार्दिक को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.म.३५

ग.म.३५ : जगत में ऐसी कहावत है कि, ‘मन होय चंगा तो कठरोट में गंगा,’ वह कहावत गलत है। कोई कितना भी समाधिनिष्ठ या विचारवान क्यों न हो, यदि वह स्त्रियों के प्रसंग में रहने लगे तो उसका धर्म किसी प्रकार टिक नहीं सकता। और कोई स्त्री कितनी भी धर्मनिष्ठ क्यों न हो, यदि उसे पुरुष का सहवास मिले तो उसका धर्म भी नहीं रह सकता। इस प्रकार स्त्री-पुरुष का परस्पर सहवास हो और फिर भी उनका धर्म बना रहे, ऐसी आशा कभी नहीं रखनी चाहिए। यह बात बिल्कुल सत्य है, इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं रखना चाहिए।


१५. जयदीप कई वर्षों से सत्संग में जुड़ा हुआ था। एक दिन सभा में एक नया युवक आने लगा। उसे अभी सत्संग की कई बातों की जानकारी नहीं थी। कभी-कभी उससे सभा के नियमों में गलती हो जाती और वह कई प्रश्न भी पूछता। जयदीप को लगता था कि उसे अभी सत्संग की समझ नहीं है। धीरे-धीरे वह उसे अपने से बहुत कम समझने लगा। अब जब भी वह युवक कोई गलती करता, तो जयदीप के मन में उसके प्रति नकारात्मक विचार आने लगते थे।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में जयदीप को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.प्र.२४

ग.प्र.२४ : जब किसी हरिभक्त का दोष दिखाई दे, तब ऐसा समझना चाहिए कि, ‘इसका स्वभाव भले ही सत्संग के अनुकूल न हो, फिर भी इसे सत्संग मिला है और यह जैसा-तैसा होकर भी सत्संग में जुड़ा हुआ है, तो अवश्य इसके पूर्वजन्म या इस जन्म के संस्कार बहुत श्रेष्ठ होंगे, तभी इसे ऐसा सत्संग मिला है।’ ऐसा समझकर उसके गुणों का पक्ष लेना चाहिए।


१६. रिया को अपने मित्रों के साथ नई फिल्में और गाने देखना बहुत पसंद था। धीरे-धीरे वह ऐसे गानों और फिल्मों की ओर आकर्षित होने लगी जिनमें अनुचित भाषा, गलत विचार और असंयमित जीवनशैली दिखाई जाती थी। शुरुआत में उसे यह केवल मनोरंजन लगता था। लेकिन कुछ समय बाद उसने महसूस किया कि उसके विचारों में परिवर्तन आने लगा है। पढ़ाई के समय भी फिल्मों के दृश्य और गानों के शब्द उसके मन में आते रहते थे। भजन, प्रार्थना और अच्छे विचारों में उसका मन कम लगने लगा।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में रिया को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.प्र.१८

ग.प्र.१८ : और पाँच इन्द्रियों के द्वारा जीव जो आहार ग्रहण करता है, यदि वह आहार शुद्ध होगा तो अन्तःकरण भी शुद्ध होगा। और अन्तःकरण शुद्ध होगा तो अखण्ड भगवान की स्मृति बनी रहेगी। यदि पाँच इन्द्रियों में से किसी एक इन्द्रिय का आहार भी मलिन हो जाए तो अन्तःकरण भी मलिन हो जाता है। इसलिए भगवान के भक्त को भगवान के भजन में जो भी विघ्न आता है, उसका कारण पाँच इन्द्रियों के विषय ही हैं, अन्तःकरण नहीं।

१७. कृति कॉलेज में पढ़ती थी। पिछले कुछ महीनों से वह एक युवक के बहुत करीब थी। लेकिन कुछ समय बाद दोनों के बीच मतभेद बढ़ गए और उनकी मित्रता टूट गई। इस घटना से कृति बहुत दुखी हो गई। जिन गतिविधियों में उसे पहले आनंद आता था, उनमें भी अब उसकी रुचि नहीं रही। वह अपने मित्रों से मिलना-जुलना टालने लगी। कई बार वह अकेले बैठकर रोती रहती या घंटों बिस्तर पर पड़ी रहती। पढ़ाई में भी उसका ध्यान कम होने लगा। उसे लगने लगा कि अब उसके जीवन में कुछ अच्छा बचा ही नहीं है।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में कृति को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : सारं.१८

सारं.१८ : मूर्ख व्यक्ति जब उलझन में पड़ता है, तब या तो सो जाता है, या रोता है, या किसी से झगड़ता है, या उपवास करता है। इन चार प्रकारों से वह अपनी उलझन दूर करने का प्रयास करता है। और यदि फिर भी अधिक उलझ जाए तो अंत में मर भी सकता है। इस प्रकार मूर्ख व्यक्ति शोक दूर करने का उपाय करता है। लेकिन ऐसा करने से न दुःख दूर होता है और न स्वभाव बदलता है। यदि समझदारी से उपाय करे तो दुःख और स्वभाव दोनों दूर हो जाते हैं। इसलिए समझदार व्यक्ति ही वास्तव में सुखी होता है।


१८. मितेश पिछले छह महीनों से एक गंभीर बीमारी से पीड़ित था। वह नियमित रूप से दवाइयाँ ले रहा था और डॉक्टर की सलाह भी मान रहा था, फिर भी उसकी तबीयत में कोई विशेष सुधार नहीं हो रहा था। शुरुआत में उसे आशा थी कि वह जल्द ही ठीक हो जाएगा, लेकिन समय बीतने के साथ उसकी निराशा बढ़ने लगी। उसके मित्र बाहर घूमते, अपने कामों में व्यस्त रहते, जबकि मितेश का अधिकांश समय घर पर ही बीतता था। लंबे समय से चल रही बीमारी के कारण उसके मन में अनेक चिंताएँ और प्रश्न उठने लगे।

प्रश्न : ऐसी लंबी बीमारी के दौरान मितेश को धैर्य और मानसिक शांति कैसे मिल सकती है?

उत्तर : ग.म.६२

ग.म.६२ : भगवान का जो भक्त होता है, उसे जो-जो प्रकार के दुःख आते हैं, उनके देने वाले काल, कर्म या माया नहीं होते; बल्कि स्वयं भगवान ही अपने भक्त की धैर्य-शक्ति को देखने के लिए दुःख भेजते हैं। फिर जैसे कोई व्यक्ति पर्दे के पीछे रहकर देखता है, वैसे ही भगवान भक्त के हृदय में रहकर उसकी धैर्य-शक्ति को देखते रहते हैं। काल, कर्म और माया में इतनी शक्ति ही कहाँ है कि वे भगवान के भक्त को दुःख दे सकें? यह सब भगवान की ही इच्छा है, ऐसा जानकर भगवान के भक्त को प्रसन्न रहना चाहिए।


१९. ध्रुव ११वीं कक्षा में पढ़ता था। बोर्ड परीक्षा निकट थी। उसे मोबाइल का कितना उपयोग करना चाहिए और समय का सही नियोजन कैसे करना चाहिए, इस बारे में उलझन थी। इसलिए उसने परम पूज्य महंत स्वामी महाराज को पत्र लिखा। उत्तर में उसे नियमित अध्ययन करने, समय का सदुपयोग करने और मोबाइल का कम उपयोग करने की सलाह मिली। शुरुआत में ध्रुव ने उस सलाह का पालन करने का प्रयास किया, लेकिन कुछ दिनों बाद उसने सोचा कि मैं अपनी तरह से सब संभाल लूँगा। वह फिर से मोबाइल और मित्रों के साथ अधिक समय बिताने लगा। जब परीक्षा का परिणाम आया तो उसके अंक अपेक्षा से बहुत कम थे। अब उसे बहुत पछतावा हो रहा था।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में ध्रुव को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.प्र.३४

ग.प्र.३४ : परमेश्वर के वचन को छोड़कर जब मनुष्य इधर-उधर डगमगाता है, तब वह क्लेश को प्राप्त होता है। और यदि वह वचन में स्थित रहे तो भगवान के आनंद के समान आनंद में रहता है। भगवान के भक्त को जितना दुःख होता है, वह तुच्छ पदार्थों के लिए भगवान की आज्ञा का उल्लंघन करने से होता है, और जितना सुख होता है, वह भगवान की आज्ञा का पालन करने से होता है।


२०. जय का एक छोटा व्यवसाय था। अचानक व्यापार में भारी नुकसान होने के कारण उसकी आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गई। घर का खर्च चलाना कठिन हो गया। कई लोगों का उधार भी चुकाना बाकी था। हर दिन नए खर्च सामने आते थे और आय बहुत कम थी। परिवार के भविष्य की चिंता उसे लगातार परेशान करती थी। रात को भी उसे ठीक से नींद नहीं आती थी। वह बार-बार सोचता था कि इस कठिनाई से बाहर कैसे निकलूँगा? परिस्थिति दिन-प्रतिदिन और कठिन होती जा रही थी।

प्रश्न : ऐसी आर्थिक कठिनाई में जय को धैर्य और मन की शांति कैसे मिल सकती है?

उत्तर : ग.म.६२

ग.म.६२ : भगवान का जो भक्त होता है, उसे जो-जो प्रकार के दुःख आते हैं, उनके देने वाले काल, कर्म या माया नहीं होते; बल्कि स्वयं भगवान ही अपने भक्त की धैर्य-शक्ति को देखने के लिए दुःख भेजते हैं। फिर जैसे कोई व्यक्ति पर्दे के पीछे रहकर देखता है, वैसे ही भगवान भक्त के हृदय में रहकर उसकी धैर्य-शक्ति को देखते रहते हैं। काल, कर्म और माया में इतनी शक्ति ही कहाँ है कि वे भगवान के भक्त को दुःख दे सकें? यह सब भगवान की ही इच्छा है, ऐसा जानकर भगवान के भक्त को प्रसन्न रहना चाहिए।


२१. पूर्वीबेन नियमित रूप से मंदिर में सेवा करती थीं। उनके साथ सेवा करने वाले एक हरिभक्त कभी-कभी समय पर नहीं आते थे और उनसे छोटी-छोटी गलतियाँ भी हो जाती थीं। शुरुआत में पूर्वीबेन ने इस बात को सामान्य रूप से लिया, लेकिन धीरे-धीरे वे उस भक्त की हर छोटी बात में कमी देखने लगीं। अब उन्हें उसके अच्छे गुणों से अधिक उसकी गलतियाँ दिखाई देने लगीं। सेवा के दौरान भी उनके मन में बार-बार यही विचार आते थे।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में पूर्वीबेन को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : कारि.९

कारि.९ : जो भगवान के महिमा को जानता है, वह भगवान के संबंध को प्राप्त हुए पशु, पक्षी, वृक्ष और लता आदि को भी देवतुल्य मानता है। तो जो मनुष्य भगवान की भक्ति करते हों, नियमों का पालन करते हों और भगवान का नामस्मरण करते हों, उन्हें देवतुल्य माने और उनका अवगुण न ले, इसमें क्या आश्चर्य है? इसलिए जो भगवान का महिमा समझता है, उसका भगवान के भक्तों के साथ कभी वैर नहीं बंधता; और जो महिमा नहीं समझता, उसका भगवान के भक्तों के साथ वैर अवश्य बंधता है।


२२. हार्दिक कई वर्षों से सत्संग में सेवा कर रहा था। हाल ही में उनके केंद्र में एक नए युवक विवेक को कई सेवाओं की जिम्मेदारी दी गई। विवेक मेहनत से सेवा करता था, इसलिए संत और हरिभक्त भी उसकी प्रशंसा करते थे। कुछ समय बाद हार्दिक के मन में विचार आने लगे कि मैं इतने वर्षों से सेवा कर रहा हूँ, फिर भी उसे मुझसे अधिक महत्व क्यों मिल रहा है? अब जब भी विवेक की प्रशंसा होती, तो हार्दिक को भीतर से बेचैनी महसूस होती।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में हार्दिक को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.प्र.४

ग.प्र.४ : जिस व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या हो, उसके गुणों को ग्रहण करना चाहिए और अपने अवगुणों का त्याग करना चाहिए। और यदि ऐसा न हो सके तथा ईर्ष्या के कारण भगवान के भक्तों का द्रोह होने लगे, तो ऐसी ईर्ष्या का भगवान के भक्त को हर प्रकार से त्याग कर देना चाहिए।

२३. निधि 10वीं कक्षा में पढ़ती थी। पिछले कुछ दिनों से उसे रात में बार-बार बुरे सपने आ रहे थे। कभी उसे लगता कि कोई उसका पीछा कर रहा है, तो कभी दुर्घटना जैसे दृश्य दिखाई देते। सुबह उठने के बाद भी उसके मन में डर बना रहता। एक दिन उसकी सहेली ने कहा कि ऐसे सपनों से बचने के लिए एक विशेष धागा बाँध लेना चाहिए। दूसरी सहेली ने किसी यंत्र के बारे में बताया। निधि उलझन में पड़ गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे और किसकी बात माने।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में निधि को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.म.३८

ग.म.३८ : संसारी जीव को यदि कोई धन देने वाला या पुत्र देने वाला मिल जाए तो उसमें तुरंत विश्वास हो जाता है, परंतु भगवान के भक्त को यंत्र-मंत्र आदि में कहीं भी विश्वास नहीं होना चाहिए। और जो हरिभक्त यंत्र-मंत्र में विश्वास करता है, वह सत्संगी होते हुए भी आधा विमुख माना जाता है।


२४. जयेशभाई के परिवार में एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना था। वे उलझन में थे, इसलिए मार्गदर्शन के लिए एक वरिष्ठ संत के पास गए। संत ने उन्हें शांतिपूर्वक समझाया कि जल्दबाज़ी न करें, परिवार के सभी सदस्यों से चर्चा करें और कुछ समय प्रतीक्षा करें। लेकिन जयेशभाई को अपनी समझ अधिक सही लगी। उन्होंने संत की सलाह के अनुसार चलने के बजाय तुरंत अपना निर्णय ले लिया। कुछ समय बाद उसी निर्णय के कारण परिवार में मतभेद और तनाव बढ़ने लगा। अब वे सोच रहे थे कि परिस्थिति इतनी कठिन क्यों बन गई।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में जयेशभाई को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.प्र.३४

ग.प्र.३४ : परमेश्वर के वचन को छोड़कर जब मनुष्य इधर-उधर डगमगाता है, तब वह क्लेश को प्राप्त होता है। और यदि वह वचन में स्थित रहे तो भगवान के आनंद के समान आनंद में रहता है। भगवान के भक्त को जितना दुःख होता है, वह तुच्छ पदार्थों के लिए भगवान की आज्ञा का उल्लंघन करने से होता है, और जितना सुख होता है, वह भगवान की आज्ञा का पालन करने से होता है।


२५. नीलमबेन एक निजी कंपनी में काम करती थीं। कार्यालय में हुई कुछ गलतियों के कारण उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वे हमेशा कहती थीं कि मेरे साथ ही बुरा होता है, लोग मुझे समझते नहीं हैं और मेरी असफलताओं का कारण दूसरे लोग हैं। धीरे-धीरे वे हर समस्या में अपनी भूमिका देखने के बजाय केवल दूसरों को ही जिम्मेदार ठहराने लगीं। परिणामस्वरूप उनके भीतर निराशा और हताशा बढ़ने लगी।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में नीलमबेन को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.अं.६

ग.अं.६ : जीवमात्र का ऐसा स्वभाव है कि जब उसमें कोई दोष आता है, तब वह कहता है, ‘मुझे किसी दूसरे ने भटका दिया, इसलिए मुझसे गलती हुई; मेरा कोई दोष नहीं है।’ परंतु ऐसा कहने वाला महा-मूर्ख है। यदि कोई दूसरा कहे कि ‘कुएँ में कूद जाओ,’ तो क्या उसके कहने से कुएँ में कूद जाना चाहिए? इसलिए दोष तो उसी का है जो ऐसा करता है, फिर भी वह दूसरों पर दोष डालता है। इसी प्रकार इन्द्रियों और अंतःकरण को दोष देना भी जीव की मूर्खता ही है।


२६. कविताबेन के विवाह को कई वर्ष हो चुके थे, लेकिन उन्हें अभी तक संतान प्राप्ति नहीं हुई थी। इस बात को लेकर वे और उनके पति बहुत चिंतित रहते थे। एक दिन पड़ोस की एक महिला ने उन्हें बताया कि एक विशेष व्यक्ति के पास जाकर उसके बताए हुए कुछ उपाय करने से निश्चित रूप से संतान प्राप्त होती है। कुछ ही दिनों में अन्य लोग भी उन्हें ऐसी ही सलाह देने लगे। कविताबेन के मन में अनेक प्रश्न उठने लगे। परिवार के दबाव और अपनी इच्छा के बीच वे बहुत उलझ गईं।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में कविताबेन को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.म.३८

ग.म.३८ : संसारी जीव को यदि कोई धन देने वाला या पुत्र देने वाला मिल जाए तो उसमें तुरंत विश्वास हो जाता है, परंतु भगवान के भक्त को यंत्र-मंत्र आदि में कहीं भी विश्वास नहीं होना चाहिए। और जो हरिभक्त यंत्र-मंत्र में विश्वास करता है, वह सत्संगी होते हुए भी आधा विमुख माना जाता है।


२७. मिलन और यश दोनों नियमित रूप से सत्संग सभा में जाते थे। एक सेवा के दौरान किसी आयोजन को लेकर दोनों के विचार अलग थे। चर्चा धीरे-धीरे विवाद में बदल गई। दोनों ने एक-दूसरे से कठोर शब्द कह दिए। उसके बाद उन्होंने आपस में बात करना भी बंद कर दिया। सभा में भी वे एक-दूसरे से बचने लगे। कई दिन बीत जाने के बाद भी मिलन के मन से वह घटना नहीं निकल रही थी। जब भी वह यश को देखता, उसे पुरानी बातें याद आ जाती थीं।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में मिलन को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : कारि.९

कारि.९ : जो भगवान के महिमा को जानता है, वह भगवान के संबंध को प्राप्त हुए पशु, पक्षी, वृक्ष और लता आदि को भी देवतुल्य मानता है। तो जो मनुष्य भगवान की भक्ति करते हों, नियमों का पालन करते हों और भगवान का नामस्मरण करते हों, उन्हें देवतुल्य माने और उनका अवगुण न ले, इसमें क्या आश्चर्य है? इसलिए जो भगवान का महिमा समझता है, उसका भगवान के भक्तों के साथ कभी वैर नहीं बंधता; और जो महिमा नहीं समझता, उसका भगवान के भक्तों के साथ वैर अवश्य बंधता है।


२८. मीत कई वर्षों से युवक मंडल में सक्रिय था। वह अनेक सेवाओं में आगे रहता और हर कार्यक्रम में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाता था। धीरे-धीरे लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। अब जब कोई सेवा सफल होती, तो मीत को लगता कि यह सब उसी के कारण हुआ है। यदि किसी और को श्रेय मिलता, तो उसे भीतर से अच्छा नहीं लगता। कुछ समय बाद उसे लगने लगा कि वह दूसरों से अधिक योग्य और अनुभवी है।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में मीत को क्या सोचना चाहिए?

उत्तर : ग.प्र.५८

ग.प्र.५८ : पक्का हरिभक्त बनने का यही उपाय है कि परमेश्वर के दास का भी दास बनकर रहे और ऐसा माने कि ‘सभी भक्त मुझसे बड़े हैं और मैं सबसे छोटा हूँ।’ इस प्रकार स्वयं को हरिभक्तों का दासानुदास मानकर रहना चाहिए।

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પરબ્રહ્મ તત્વ ભાગ-2- Solution

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