प्रवेश - शास्त्रीजी महाराज - – प्रकरण 16 से 20 का सारांश

 Chapter - 16 Summary 

लक्ष्मीवाड़ी में श्रीजीमहाराज के समाधिस्थान पर मूर्ति-प्रतिष्ठा के समय यज्ञपुरुषदासजी गढ़डा आए। उन्होंने शास्त्रार्थ में प्रखर विद्वानों को पराजित कर अपनी अद्वितीय विद्वत्ता सिद्ध की। रंगाचार्य और भगतजी महाराज ने उनकी ब्रह्मस्थिति और अक्षरपुरुषोत्तम की दृढ़ निष्ठा को पहचाना। यज्ञपुरुषदासजी ने विभिन्न स्थानों पर अक्षरपुरुषोत्तम उपासना का प्रचार किया और अनेक हरिभक्तों व विद्यार्थियों को दृढ़ निष्ठावान बनाया। ज्ञान और भक्ति में वे अद्वितीय थे।

4) Chapter - 16 Last-Minute Revision Points 

  • लक्ष्मीवाड़ी में मूर्ति-प्रतिष्ठा

  • यज्ञपुरुषदासजी का गढ़डा आगमन

  • शास्त्रार्थ में विद्वानों पर विजय

  • रंगाचार्य व भगतजी महाराज की मान्यता

  • अक्षरपुरुषोत्तम निष्ठा का प्रचार

  • हरिभक्तों व विद्यार्थियों पर प्रभाव

  • ज्ञान-भक्ति में अद्वितीयता

Chapter - 17 Summary 
गढ़डा में जलझीलणी के समैया पर भगतजी ने यज्ञपुरुषदासजी को राजकोट में पढ़ने की आज्ञा दी और काशी न जाने को कहा। उन्होंने यज्ञपुरुषदासजी को सभी के अंतःकरण को शुद्ध करने वाली सावरनी बताया। राजकोट जाने के उद्देश्य संस्कृत अध्ययन, निकट रहना और जागा भक्त का समागम थे। राजकोट में यज्ञपुरुषदासजी ने अध्ययन के साथ सत्संगी विद्यार्थियों की सहायता की और शुद्ध उपासना का प्रचार किया। विरोध के बावजूद, सद्गुरु बालमुकुंद स्वामी ने स्पष्ट किया कि मंदिर सेवा, उपवास और कथा-वार्ता सुधारक हैं। पूरे प्रसंग में यज्ञपुरुषदासजी मौन और धैर्यवान रहे।

4) Chapter - 17 Last-Minute Revision Points 

  • जलझीलणी के समैया पर आज्ञा

  • राजकोट अध्ययन, काशी नहीं

  • “अंतःकरण शुद्ध करने वाली सावरनी”

  • संस्कृत अध्ययन और जागा भक्त समागम

  • सत्संगी विद्यार्थियों की सेवा

  • विरोध और शिकायतें

  • बालमुकुंद स्वामी का समर्थन

  • यज्ञपुरुषदासजी का मौन

Chapter - 18 Summary
जूनागढ़ में जगा भक्त को कथा और आसन पर बैठने से रोका गया, जिससे उन्हें दुःख हुआ। यह जानकर यज्ञपुरुषदासजी राजकोट से जूनागढ़ आए और निर्भय होकर जगा भक्त से मिले। उन्होंने कोठारी को समझाकर प्रतिबंध हटवाया। कोठारी ने अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा माँगी और जगा भक्त को फिर से सभा में बैठने की अनुमति दी। जगा भक्त यज्ञपुरुषदासजी पर अत्यंत प्रसन्न हुए और अनेक मुमुक्षुओं के कल्याण का द्वार खुलने का आशीर्वाद दिया। इस प्रसंग से यज्ञपुरुषदासजी की महानता प्रसिद्ध हुई।

4) Chapter - 18 Last-Minute Revision Points

  • जगा भक्त पर कथा की रोक

  • यज्ञपुरुषदासजी का जूनागढ़ आगमन

  • निर्भयता से जगा भक्त से भेंट

  • कोठारी को समझाकर रोक हटाई

  • कोठारी की क्षमा याचना

  • जगा भक्त का आशीर्वाद

  • यज्ञपुरुषदासजी की महिमा

Chapter - 19 Summary
सत्संगिजीवन की कथा में यज्ञपुरुषदासजी की अनोखी शैली, वचनामृत का शुद्ध ज्ञान और शास्त्रों के आधार पर दृष्टांतों से सभी प्रसन्न हुए। हरिलाल सेठ ने उन्हें विशेष मान दिया और प्रथम पूजन के योग्य माना। ईर्ष्या से किए गए अपमान के उत्तर में यज्ञपुरुषदासजी ने स्पष्ट किया कि गुरुता गुणों पर आधारित होती है। उन्होंने विनम्रता से अपना पूजन टालकर वृद्ध साधु का पूजन करवाया। बाद में राजकोट में अध्ययन के दौरान शांकर और रामानुज भाष्यों का विवेचन कर जीवनराम शास्त्री को विशिष्टाद्वैत की ओर प्रवृत्त किया और उन्हें सत्संगी बनाया।

4) Chapter - 19 Last-Minute Revision Points

  • सत्संगिजीवन कथा में प्रभावशाली वक्तृत्व

  • वचनामृत व शास्त्राधारित दृष्टांत

  • हरिलाल सेठ का विशेष सम्मान

  • ईर्ष्याभरे अपमान का तत्त्वपूर्ण उत्तर

  • विनम्रता से अपना पूजन टालना

  • राजकोट में शास्त्रीय अध्ययन

  • जीवनराम शास्त्री का परिवर्तन

  • जीवनराम का सत्संगी बनना

Chapter - 20 Summary
यज्ञपुरुषदासजी को भगतजी महाराज के प्रति अपार गुरु-भक्ति थी। उन्होंने प्रागजी भक्त को जन्माष्टमी के समैया पर जूनागढ़ मंदिर में सम्मानपूर्वक आमंत्रित करने के लिए आचार्य महाराज से निवेदन किया। आचार्य महाराज की आज्ञा से आमंत्रण हुआ और आवश्यक व्यवस्थाएँ की गईं। पहले आचार्य महाराज की आज्ञा से भगतजी महाराज को मंदिर छोड़ना पड़ा था, अब उसी आज्ञा से वे धूमधाम से लौटे। समैया में भगतजी महाराज और जगा भक्त ने गुणातीत ज्ञान की कथाएँ करके भक्तों को आनंदित किया।

4) Chapter - 20 Last-Minute Revision Points

  • यज्ञपुरुषदासजी की अपार गुरु-भक्ति

  • प्रागजी भक्त के सम्मान का संकल्प

  • जन्माष्टमी समैया पर आमंत्रण

  • आचार्य महाराज की आज्ञा

  • धूमधाम से पुनः आगमन

  • गुणातीत ज्ञान की कथाएँ

  • भक्तों का आनंद

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