परिचय – प्रागजी भक्त – प्रकरण 16 से 20 का सारांश
Chapter - 16 Summary
जूनागढ़ में भीम एकादशी के समैया पर हजारों हरिभक्तों की उपस्थिति में स्वामी ने प्रागजी भक्त के प्रति अपना गहरा स्नेह प्रकट किया। सत्संग से विमुख किए गए प्रागजी भक्त के लिए स्वामी ने तीव्र पीड़ा व्यक्त की। इसके बाद स्वामी देश भ्रमण पर निकले और सत्संग में भ्रमण कर महुवा में रहने का संकेत दिया, जो प्रागजी भक्त के माध्यम से अपने प्रकट होने का द्योतक था। यात्रा के दौरान अनेक स्थानों पर पधारामणी की। आसो सुद 1 के दिन स्वामी ने देह त्याग कर अक्षरधाम में श्रीजी महाराज की सेवा में प्रवेश किया, जिससे पूरे सत्संग में गहरा विरह फैल गया।
4) Chapter - 16 Last-Minute Revision Points
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भीम एकादशी का समैया
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प्रागजी भक्त के प्रति गहरा स्नेह
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विमुख करने वालों की निंदा
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देश भ्रमण की घोषणा
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प्रागजी भक्त द्वारा प्रकट होने का संकेत
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विभिन्न स्थानों पर पधारामणी
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आसो सुद 1 को देह त्याग
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सत्संग में विरह
Chapter - 17 Summary
लगभग तीन वर्षों तक सत्संग से विमुख रहने के बाद भी प्रागजी भक्त की दिव्य भावना, साधुता और परम एकांतिक ब्रह्मस्थिति को महान सद्गुरुओं ने अनुभव किया और सभी ने मिलकर उन्हें पुनः सत्संग में स्वीकार किया। उनकी अलौकिक अवस्था के कारण उन्हें अब “भगतजी” कहा जाने लगा। भगतजी वर्ताल में रहते हुए देशभर में संतों के साथ विचरण करते और समैयों में कथावार्ता द्वारा भक्तों को शांति देते। अनेक मुमुक्षुओं, साधुओं और कोठारियों को उनके समागम से दृढ़ निष्ठा प्राप्त हुई और कई लोगों ने दीक्षा ली।
4) Chapter - 17 Last-Minute Revision Points
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तीन वर्ष बाद सत्संग में पुनः स्वीकृति
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परम एकांतिक ब्रह्मस्थिति
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“भगतजी” नाम की मान्यता
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वर्ताल निवास और देश भ्रमण
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कथावार्ता से शांति
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गिरधरभाई को दीक्षा (विज्ञानदासजी)
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बेचर भगत को दीक्षा (महापुरुषदास)
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सद्गुरुओं को शांति
Chapter - 18 Summary
संवत 1939 में सूरत मंदिर की मूर्ति-प्रतिष्ठा के अवसर पर भगतजी महाराज की ब्रह्मस्थिति, मधुर वाणी और दिव्य आचरण से यज्ञपुरुषदासजी अत्यंत प्रभावित हुए और मन ही मन उन्हें गुरु स्वीकार किया। भगतजी से गुणातीतानंद स्वामी के अक्षर होने और श्रीजी महाराज के धामरूप होने की बात सुनकर उन्हें दृढ़ निश्चय हुआ। भगतजी महाराज का यज्ञपुरुषदासजी के प्रति विशेष स्नेह था। समय के साथ अनेक त्यागी संत निर्भय होकर भगतजी का समागम करने लगे और सत्संग में उनका महिमावर्धन हुआ। भगतजी ने शिष्यों को विनम्रता, सहनशीलता और सर्वजीवों के प्रति दया का उपदेश दिया।
4) Chapter - 18 Last-Minute Revision Points
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संवत 1939, सूरत मंदिर मूर्ति-प्रतिष्ठा
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भगतजी महाराज की ब्रह्मस्थिति
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यज्ञपुरुषदासजी द्वारा गुरु-स्वीकृति
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गुणातीतानंद स्वामी के अक्षर होने की मान्यता
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यज्ञपुरुषदासजी के प्रति विशेष स्नेह
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त्यागी संतों का समागम
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सत्संग में महिमा वृद्धि
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दया और विनम्रता का उपदेश
Chapter - 19 Summary
भगतजी का प्रभाव बढ़ने पर कुछ साधुओं ने उनका विरोध किया। तब भगतजी ने समझाया कि भगवान उसी को “वळगते” हैं, जिसे भगवान में अत्यधिक प्रेम और आसक्ति हो। उन्होंने गोपियों की प्रेमलक्षणा भक्ति का उदाहरण दिया और श्रीजी महाराज की मूर्ति के अखंड सुख का अनुभव होने की बात कही, जिसे वे अपने संग करने वालों को भी देते हैं। पेटलाद में जमादार को सत्पुरुष के लक्षण समझाकर शांति दी और संतों को निरभिमान, धैर्य और सहनशीलता रखने की सीख दी।
4) Chapter - 19 Last-Minute Revision Points
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बढ़ते प्रभाव पर विरोध
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अत्यधिक प्रेम पर भगवान की कृपा
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गोपियों की प्रेमलक्षणा भक्ति
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अखंड सुख का अनुभव
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पेटलाद में जमादार को शांति
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संतों को धैर्य और निरभिमानता
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आने वाले कष्टों की चेतावनी
Chapter - 20 Summary
गुजरात में भगतजी के विचरण से सत्संग में व्यापक समास हुआ। प्रागजी भगत के माध्यम से भगवान प्रगट हैं—इस अनुभूति से अनेक हरिभक्तों का निश्चय दृढ़ हुआ। कुछ संतों के विरोध के कारण भगतजी से जुड़े संतों को सत्संग से अलग किया गया। महुवा में भगतजी के समागम से यज्ञपुरुषदासजी सहित संतों को अखंड योग प्राप्त हुआ। यज्ञपुरुषदासजी ने युक्तिपूर्वक सिद्ध किया कि भगतजी में धर्म, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति—चारों गुण प्रत्यक्ष प्रगट हैं। विरोध के बावजूद भगतजी के संत निष्ठापूर्वक सेवा करते रहे।
4) Chapter - 20 Last-Minute Revision Points
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गुजरात में व्यापक समास
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प्रागजी भगत द्वारा प्रगटत्व की अनुभूति
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विरोध और संतों का बहिष्कार
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महुवा में अखंड समागम
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धर्म, ज्ञान, वैराग्य, भक्ति का प्रगटीकरण
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हरिभक्तों की साक्षी
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विरोध में भी अडिग निष्ठा


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