પ્રવેશ - શાસ્ત્રીજી મહારાજ પ્રકરણ 36 થી 40 - સમરી
૩૬. સારંગપુરની શોભા | ૩૭. ગંગા-સાગરના સંગમ | ૩૮. સ્વામીશ્રીની મહત્તા | ૩૯. “ગુણાતીત માટે મૂંડાવ્યું છે” | ૪૦. સારંગપુર મંદિરમાં મૂર્તિપ...
प्रेम, देखभाल और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का जीवंत चित्र
योगीजी महाराज को युवक और बच्चे बहुत प्रिय थे। वे कहते थे:
“युवक मेरा हृदय हैं।”
हृदय की तरह ही वे युवकों की रक्षा करते और प्रेम से उन्हें अपना बना लेते।
युवकों को प्रेम से बुलाते, उनकी बातें सुनते, सिर और गले पर हाथ फेरते,
और कंठी पहनी है या नहीं यह भी देखते।
यदि कंठी न हो तो स्वयं पहनाते और माता से भी अधिक स्नेह से संभालते।
युवाओं का रूपांतरण — सेवा, साधुता और कल्याण का मार्ग
दस वर्षों में योगीजी महाराज के आसपास सुंदर युवकों का समूह तैयार हुआ। वे सादा जीवन जीते, उपवास करते, अनुशासन रखते और नियमित साधना करते।
विस्तार, सेवा और वैश्विक सत्संग का महान प्रवाह
स्वामिनारायण संप्रदाय के विस्तार के लिए योगीजी महाराज ने दिन-रात भ्रमण करके गाँव-गाँव सत्संग फैलाया।
विदेशों में सत्संग का दिव्य प्रसार
योगीजी महाराज अफ्रीका गए और हजारों लोगों को सत्संग से जोड़ा।
योगीजी महाराज का दिव्य प्रवास और अंतिम विदाई
अंत में उन्होंने “जय स्वामिनारायण” कहकर शरीर त्याग दिया।
૩૬. સારંગપુરની શોભા | ૩૭. ગંગા-સાગરના સંગમ | ૩૮. સ્વામીશ્રીની મહત્તા | ૩૯. “ગુણાતીત માટે મૂંડાવ્યું છે” | ૪૦. સારંગપુર મંદિરમાં મૂર્તિપ...
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