वचनामृत का जीवन में उपयोग (Real Life Incidents)

 ग.म.६२ : भगवान का जो भक्त होता है, उसे जो-जो प्रकार के दुःख आते हैं, उन दुःखों को देने वाले काल, कर्म और माया में से कोई नहीं होते; बल्कि स्वयं भगवान ही अपने भक्त की धैर्य-शक्ति देखने के लिए दुःख को प्रेरित करते हैं। और फिर जैसे कोई पुरुष पर्दे के पीछे रहकर देखता है, वैसे ही भगवान भक्त के हृदय में रहकर उसकी धैर्य-शक्ति को देखते रहते हैं। परंतु काल, कर्म और माया का ऐसा क्या सामर्थ्य है कि वे भगवान के भक्त को पीड़ा दे सकें? यह तो केवल भगवान की ही इच्छा है, ऐसा जानकर भगवान के भक्त को प्रसन्न और आनंदित रहना चाहिए।

  • जब दुर्घटना हुई हो।

  • जब बीमारी लंबे समय से चल रही हो।

  • जब पैसों की भारी परेशानी आ गई हो।

  • जब व्यापार में नुकसान हुआ हो।

  • जब कोई अपमान करे।

  • जब किसी निकट व्यक्ति ने धोखा दिया हो।

  • जब परिवार की ओर से दुःख मिल रहा हो।

  • जब परीक्षा में असफल हुए हों।

  • जब मेहनत के बावजूद सफलता न मिल रही हो।

  • जब भगवान का भजन करते हुए भी दुःख आ रहा हो।

  • जब मन में “मेरे साथ ही ऐसा क्यों?” ऐसा विचार आता हो।

  • जब लगातार कठिनाइयाँ आ रही हों।

  • जब मानसिक तनाव चल रहा हो।

  • जब नौकरी चली गई हो।

  • जब लोग गलत समझ रहे हों।

  • जब किसी प्रिय व्यक्ति का निधन हो गया हो।

  • जब सेवा/सत्संग में उपेक्षा हो रही हो।

  • जब शरीर में लगातार पीड़ा बनी हुई हो।

  • जब जीवन में सब कुछ गलत चल रहा हो ऐसा लग रहा हो।

  • जब धैर्य टूट रहा हो।


ग.म.३८ : जो सांसारिक जीव होता है, उसे यदि कोई धन देने वाला मिल जाए या पुत्र देने वाला मिल जाए तो उसे तुरंत विश्वास हो जाता है। परंतु भगवान के भक्त को तो कभी भी यंत्र-मंत्र में विश्वास नहीं होना चाहिए। और जो हरिभक्त होकर भी यंत्र-मंत्र में विश्वास करता है, वह सत्संगी होते हुए भी आधा विमुख समझना चाहिए।

  • जब कोई कहे कि धागा बाँधने से काम हो जाएगा।

  • जब जादू-टोने पर विश्वास आने लगे।

  • जब भुवा-भराड़ी (तांत्रिकों) के पास जाने का मन हो।

  • जब डर लग रहा हो और तांत्रिक उपाय करवाने के लिए कहा जाए।

  • जब बीमारी में यंत्र-मंत्र आज़माने के लिए कहा जाए।

  • जब व्यापार नहीं चल रहा हो इसलिए टोटके करवाने के लिए कहा जाए।

  • जब कोई कहे, “यह उपाय करोगे तो तुरंत लाभ होगा।”

  • जब बुरे सपने आ रहे हों।

  • जब संतान प्राप्ति के लिए अंधविश्वास की ओर जाने के लिए कहा जाए।

  • जब ग्रह-दोष या ग्रह-बाधा के नाम पर डराया जा रहा हो।

  • जब कोई व्यक्ति भगवान से अधिक टोटकों को बड़ा बताता हो।

  • जब कठिनाई में श्रद्धा डगमगा रही हो।

  • जब “यह बाबा सब कुछ ठीक कर देगा” जैसी बातों में फँसने का मन हो।

  • जब WhatsApp के अंधविश्वास फैलाने वाले संदेशों पर विश्वास आने लगे।

  • जब काले जादू का डर दिखाया जा रहा हो।

  • जब भगवान पर विश्वास कम हो रहा हो।

  • जब लोग अंधविश्वास के लिए दबाव डाल रहे हों।

  • जब हाथ दिखाने या भाग्य बदलवाने के चक्कर में पड़ रहे हों।

  • जब भय के कारण गलत उपाय करने का मन हो।

  • जब सच्ची भक्ति छोड़कर टोटकों में आशा रखी जा रही हो।

ग.प्र.१६ : “जिस भगवान के भक्त को सत् और असत् का विवेक होता है, वह अपने भीतर जो-जो अवगुण होते हैं उन्हें पहचानता है और विचार करके उनका त्याग कर देता है। तथा जो अच्छा विचार होता है उसे ग्रहण करता है और जो गलत विचार होता है उसका त्याग कर देता है।”

  • जब अपनी बुरी आदतों को पहचानना हो।

  • जब क्रोध, आलस्य, ईर्ष्या जैसे अवगुणों को छोड़ना हो।

  • जब प्रतिदिन आत्म-सुधार करना हो।

  • जब मन में गलत विचार आते हों।

  • जब अच्छी आदतें विकसित करनी हों।

  • जब सोशल मीडिया के बुरे प्रभाव से बचना हो।

  • जब बुरी संगति छोड़नी हो।

  • जब यह विचार करना हो कि “मेरे अंदर क्या कमी है?”

  • जब आलोचना मिलने के बाद स्वयं को सुधारना हो।

  • जब आवेगपूर्ण सोच को रोकना हो।

  • जब सकारात्मक दृष्टिकोण बनाना हो।

  • जब निर्णय लेते समय सही और गलत की पहचान करनी हो।

  • जब चरित्र निर्माण करना हो।

  • जब आत्म-जागरूकता बढ़ानी हो।

  • जब अहंकार के कारण अपनी गलती दिखाई नहीं देती हो।

  • जब मन में आने वाले हर विचार को सही न मानना हो।

  • जब अनुशासन और संस्कार विकसित करने हों।

  • जब आध्यात्मिक उन्नति करनी हो।

  • जब भीतर के अवगुणों को धीरे-धीरे दूर करना हो।

  • जब समझदारी से जीवन जीना हो।


ग.म.४१ : जिसे परमेश्वर का भजन करना हो, उसे जब भगवान या भगवान के भक्त की सेवा करने का अवसर मिले, तब उसे अपना महान सौभाग्य मानकर सेवा करनी चाहिए। वह सेवा भी भगवान को प्रसन्न करने और अपने कल्याण के लिए भक्तिभाव से करनी चाहिए, न कि इसलिए कि कोई उसकी प्रशंसा करे।

  • जब सेवा करने के बाद प्रशंसा की अपेक्षा रखते हों।

  • जब प्रशंसा न मिलने पर मन दुःखी हो जाता हो।

  • जब दिखावे के लिए सेवा करते हों।

  • जब मंदिर की छोटी सेवा करने से बचते हों।

  • जब “मुझे क्या मिलेगा?” इस विचार से सेवा करते हों।

  • जब सोशल मीडिया पर सेवा का प्रदर्शन करते हों।

  • जब भगवान को प्रसन्न करने के लिए निःस्वार्थ सेवा करनी हो।

  • जब भक्तों की सेवा को एक अवसर के रूप में देखना हो।

  • जब प्रसिद्धि से अधिक भाव का महत्व समझना हो।

  • जब चुपचाप सेवा करने की आदत डालनी हो।

  • जब दूसरे लोगों की प्रशंसा होने पर ईर्ष्या आती हो।

  • जब सेवा के द्वारा विनम्रता लानी हो।

  • जब सफाई, व्यवस्था आदि जैसी छोटी सेवाएँ करनी हों।

  • जब निःस्वार्थ भाव विकसित करना हो।

  • जब सेवा करते समय अहंकार आ जाता हो।

  • जब यह विचार आता हो कि “मेरी सेवा किसी ने देखी ही नहीं।”

  • जब भगवान के लिए कार्य करना सीखना हो।

  • जब सेवा को कल्याण का मार्ग समझना हो।

  • जब बिना पहचान या सम्मान मिले भी उत्साह से सेवा करनी हो।

  • जब सच्चे भक्तिभाव से सेवा का जीवन जीना हो।

ग.प्र.१८ : और जीव पाँच इन्द्रियों के द्वारा जो आहार ग्रहण करता है, यदि वह आहार शुद्ध होगा तो अंतःकरण भी शुद्ध होगा। और जब अंतःकरण शुद्ध होगा तब भगवान की अखंड स्मृति बनी रहेगी। परंतु यदि पाँच इन्द्रियों में से किसी एक इन्द्रिय का आहार भी अशुद्ध हो जाए तो अंतःकरण भी अशुद्ध हो जाता है। इसलिए भगवान के भक्त को भगवान के भजन में जो भी विघ्न आता है, उसका कारण अंतःकरण नहीं, बल्कि पाँचों इन्द्रियों के विषय ही हैं।

  • जब मोबाइल में गलत सामग्री देखने से मन बिगड़ रहा हो।

  • जब सोशल मीडिया की लत बढ़ती जा रही हो।

  • जब बुरे गीतों या फिल्मों के कारण विचार खराब हो रहे हों।

  • जब बुरी संगति के कारण मन अशांत हो रहा हो।

  • जब भजन में मन नहीं लग रहा हो।

  • जब अशुद्ध चीजें देखने या सुनने से विचार बिगड़ रहे हों।

  • जब अत्यधिक मनोरंजन के कारण एकाग्रता कम हो रही हो।

  • जब मन में लगातार सांसारिक विचार आते रहते हों।

  • जब आँखों और कानों का दुरुपयोग हो रहा हो।

  • जब आध्यात्मिक एकाग्रता बनाए रखनी हो।

  • जब शुद्ध वातावरण बनाए रखना हो।

  • जब यह समझना हो कि हम जो ग्रहण करते हैं उसका प्रभाव मन पर पड़ता है।

  • जब इंटरनेट के उपयोग को नियंत्रित करना हो।

  • जब मन को प्रलोभनों से बचाना हो।

  • जब भगवान की स्मृति बढ़ानी हो।

  • जब नकारात्मक सामग्री से बचना हो।

  • जब मन का शुद्धिकरण (Mind Detox) करना हो।

  • जब इन्द्रियों पर नियंत्रण लाना हो।

  • जब दैनिक जीवन में पवित्रता बनाए रखनी हो।

  • जब भक्ति में आने वाले विघ्नों का वास्तविक कारण समझना हो।


लोया-१८ : जब भगवान के प्रति दिव्यभाव नहीं होता, तब व्यक्ति बात-बात में भ्रमित होता है और गुण-अवगुण देखने लगता है। वह सोचता है, “ये उनकी तरफ पक्षपात करते हैं, हमारी तरफ नहीं; इन्हें अधिक बुलाते हैं, हमें नहीं बुलाते; इन्हें अधिक प्रेम करते हैं, हमें नहीं।” इस प्रकार वह गुण-अवगुण का विचार करता रहता है। इससे उसका अंतःकरण दिन-प्रतिदिन पीछे हटता जाता है और अंत में वह विमुख हो जाता है।

  • जब ऐसा लगता हो कि “मुझे महत्व नहीं दिया जाता।”

  • जब सत्संग में पक्षपात महसूस होता हो।

  • जब किसी दूसरे भक्त को अधिक ध्यान मिलता हो।

  • जब संत किसी और से अधिक बात करते हों।

  • जब ईर्ष्या के कारण मन उदास हो जाता हो।

  • जब तुलना के कारण श्रद्धा कम हो रही हो।

  • जब मन में यह विचार आता हो कि “मेरी कदर नहीं है।”

  • जब छोटी-सी बात से मन दुःखी हो जाता हो।

  • जब गुणों की अपेक्षा अवगुण अधिक दिखाई देते हों।

  • जब सत्संग में गलतफहमियाँ बढ़ रही हों।

  • जब अहंकार के कारण दूरी आ रही हो।

  • जब ध्यान आकर्षित करने की मानसिकता छोड़नी हो।

  • जब दिव्यभाव रखना हो।

  • जब संत या भक्त के प्रति नकारात्मक धारणाएँ बन रही हों।

  • जब पक्षपात के विचार से मन बिगड़ रहा हो।

  • जब भीतर से नापसंदगी बढ़ रही हो।

  • जब सत्संग छोड़ने का भाव आ रहा हो।

  • जब प्रशंसा न मिलने पर भी स्थिर रहना हो।

  • जब भगवान के कार्य में मान-अपमान छोड़ना हो।

  • जब गुण-अवगुण में फँसे बिना भक्ति करनी हो।


ग.म.५५ : जैसे कबूतर के बच्चों में कौन अच्छा है और कौन बुरा, यह अलग नहीं किया जा सकता; सभी एक ही घोंसले के होते हैं। उसी प्रकार मायिक पदार्थ भी सभी समान हैं।

  • जब iPhone और Android के प्रति अत्यधिक लगाव हो।

  • जब ब्रांडेड वस्तुओं के पीछे अत्यधिक भाग रहे हों।

  • जब ऐसा लगता हो कि “यह मिल जाए तभी सुख मिलेगा।”

  • जब धन और वस्तुओं के कारण श्रेष्ठता का अनुभव करते हों।

  • जब विलासिता की वस्तुओं के कारण ईर्ष्या होती हो।

  • जब भौतिक वस्तुओं को अत्यधिक महत्व देते हों।

  • जब नई वस्तु मिलने के बाद भी संतोष न होता हो।

  • जब खरीदारी की लत बढ़ रही हो।

  • जब सांसारिक वस्तुओं में स्थायी सुख खोज रहे हों।

  • जब तुलना के कारण दुःखी होते हों।

  • जब सादगी सीखनी हो।

  • जब वस्तुओं के पीछे मन को परेशान नहीं करना हो।

  • जब लोभ पर नियंत्रण करना हो।

  • जब यह समझना हो कि सभी वस्तुएँ अंततः नाशवान हैं।

  • जब ब्रांड और प्रतिष्ठा के अहंकार से बचना हो।

  • जब संतोषी स्वभाव विकसित करना हो।

  • जब भौतिकवाद को कम करना हो।

  • जब अनावश्यक इच्छाओं को घटाना हो।

  • जब आध्यात्मिक सुख को अधिक महत्वपूर्ण समझना हो।

  • जब यह समझना हो कि सच्चा सुख वस्तुओं में नहीं, बल्कि भगवान में है।

ग.अं.३९ : अपने आपको शरीर से पृथक आत्मा जानना चाहिए। और वह आत्मा न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न कणबी है; न वह किसी का पुत्र है, न किसी का पिता है; उसकी कोई जाति नहीं है, कोई नात नहीं है। वह आत्मा सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी तथा चेतन है।

  • जब अपने शरीर या रूप-रंग को लेकर असुरक्षा (Insecurity) महसूस होती हो।

  • जब जाति या समुदाय का अहंकार आ रहा हो।

  • जब “लोग क्या कहेंगे?” इसी चिंता में जी रहे हों।

  • जब रिश्तों और पहचान में अत्यधिक उलझ जाते हों।

  • जब शरीर के वृद्ध होने से दुःखी होते हों।

  • जब त्वचा के रंग या रूप-रंग के कारण स्वयं को कमतर समझते हों।

  • जब मृत्यु का भय लगता हो।

  • जब अपनी कीमत (Self-Worth) को केवल शरीर से जोड़ते हों।

  • जब जाति और नात-पात के भेदभाव में फँस जाते हों।

  • जब “मैं इस परिवार का हूँ” या “मैं इस पद का हूँ” ऐसा अहंकार आता हो।

  • जब अपनी आध्यात्मिक पहचान समझनी हो।

  • जब आंतरिक आत्मविश्वास बढ़ाना हो।

  • जब यह समझना हो कि शरीर अस्थायी है।

  • जब अपमान से कम आहत होना हो।

  • जब आध्यात्मिक दृष्टिकोण विकसित करना हो।

  • जब तुलना और हीनभावना को दूर करना हो।

  • जब रिश्तों के प्रति आसक्ति में संतुलन रखना हो।

  • जब आत्मा को शुद्ध और दिव्य समझना हो।

  • जब सांसारिक पहचान और लेबल से ऊपर उठना हो।

  • जब अपनी वास्तविक पहचान को समझना हो।


ग.प्र.२४ : जब किसी हरिभक्त का दोष दिखाई दे, तब ऐसा समझना चाहिए कि, “इसका स्वभाव ऐसा है जो सत्संग से आसानी से दूर होने वाला नहीं है, फिर भी इसे सत्संग प्राप्त हुआ है और यह जैसा भी है, फिर भी सत्संग में बना हुआ है। इसलिए इसके पूर्वजन्म या इस जन्म के संस्कार बहुत श्रेष्ठ होंगे, तभी इसे ऐसा सत्संग मिला है।” ऐसा समझकर उसके गुणों का ही अधिक ग्रहण करना चाहिए।

  • जब किसी हरिभक्त का अवगुण दिखाई दे।

  • जब सत्संग में किसी का स्वभाव कठिन लगता हो।

  • जब मन में यह विचार आए कि “ऐसा व्यक्ति भी सत्संग में क्यों है?”

  • जब किसी भक्त की गलती देखकर उसे नापसंद करने लगते हों।

  • जब कोई क्रोधी या अड़ियल स्वभाव का भक्त मिले।

  • जब तुरंत दूसरों का निर्णय (Judge) करने की आदत हो।

  • जब किसी भक्त का भूतकाल जानकर उसके प्रति सम्मान कम हो जाता हो।

  • जब नए सत्संगी को कम महत्व देते हों।

  • जब पूर्णता (Perfection) की अपेक्षा के कारण मन दुःखी होता हो।

  • जब गुणों की अपेक्षा दोष अधिक दिखाई देते हों।

  • जब भक्त का महिमा-भाव रखना हो।

  • जब लोगों को सुधारने का अवसर देना हो।

  • जब सत्संग के संस्कारों का महत्व समझना हो।

  • जब सहनशीलता और समझदारी बढ़ानी हो।

  • जब आलोचना करने की मानसिकता कम करनी हो।

  • जब “हर व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छा है” यह देखना हो।

  • जब सत्संग की एकता बनाए रखनी हो।

  • जब भक्तों के प्रति सम्मान बनाए रखना हो।

  • जब दोष नहीं, बल्कि गुण ग्रहण करने की आदत डालनी हो।

  • जब भगवान के आश्रितों के प्रति सकारात्मक दृष्टि रखनी हो।

ग.अं.२५

ग.अं.२५ : भगवान की प्रसन्नता केवल उसी पर होती है जो बहुत सारे उपचारों और भव्य साधनों से भक्ति करता है, और गरीब पर नहीं होती — ऐसा नहीं है। यदि कोई गरीब भी श्रद्धा सहित जल, पत्र, फल और फूल भगवान को अर्पित करे तो भगवान उससे भी प्रसन्न हो जाते हैं।

  • जब पैसे कम होने पर भी भक्ति करनी हो।

  • जब ऐसा लगता हो कि “मेरे पास कुछ नहीं है, इसलिए भगवान प्रसन्न नहीं होंगे।”

  • जब दूसरे लोग बड़ी सेवा करते हों और स्वयं वैसी सेवा न कर पाते हों।

  • जब छोटा दान देते समय शर्म आती हो।

  • जब साधारण पूजा करने पर हीनभावना होती हो।

  • जब गरीबी के कारण निराशा आती हो।

  • जब कम साधनों में भी भक्ति करने का मन दृढ़ करना हो।

  • जब दिखावे वाली भक्ति देखकर मन डगमगाता हो।

  • जब अपनी छोटी सेवा भी व्यर्थ लगती हो।

  • जब यह समझना हो कि भक्ति में भाव सबसे बड़ा है।

  • जब बच्चों को भावपूर्वक भक्ति सिखानी हो।

  • जब यह समझाना हो कि “भगवान को हृदय चाहिए, धन नहीं।”

  • जब यह समझना हो कि थोड़ी-सी वस्तु से भी भगवान को प्रसन्न किया जा सकता है।

  • जब अपनी परिस्थिति के कारण सत्संग में पीछे रह जाने की भावना आती हो।

  • जब भक्ति में तुलना होती हो।

  • जब कम होने पर भी भगवान को अर्पण करने की भावना रखनी हो।

  • जब सादगी में भी सच्ची भक्ति जीनी हो।

  • जब सेवा छोटी हो, फिर भी भावपूर्वक करनी हो।

  • जब यह समझाना हो कि भगवान भाव के भूखे हैं।

  • जब आर्थिक कठिनाइयों में भी श्रद्धा बनाए रखनी हो।


ग.प्र.३४

ग.प्र.३४ : जब मनुष्य परमेश्वर के वचन को छोड़कर इधर-उधर भटकता है तब क्लेश पाता है, और यदि भगवान की आज्ञा में रहता है तो भगवान के आनंद के समान आनंद में रहता है। भगवान के भक्त को जितना दुःख होता है, वह तुच्छ पदार्थों के लिए भगवान की आज्ञा का उल्लंघन करने से होता है; और जितना सुख होता है, वह भगवान की आज्ञा का पालन करने से होता है।

  • जब माता-पिता की सही बात न मानने के कारण परेशानी में पड़ गए हों।

  • जब संत या गुरु की आज्ञा तोड़कर पछतावा हुआ हो।

  • जब गलत मित्र-मंडली में जाकर जीवन बिगड़ रहा हो।

  • जब मोबाइल या व्यसन के कारण नियम टूट रहे हों।

  • जब मनमानी करने से क्लेश बढ़ रहा हो।

  • जब भगवान के नियम छोड़ने के बाद शांति चली गई हो।

  • जब गलत संबंध रखने से दुःख मिला हो।

  • जब क्रोध में गलत निर्णय लिया हो।

  • जब लोभ के कारण परेशानी आई हो।

  • जब “जो मुझे अच्छा लगे वही सही है” ऐसा मानने से नुकसान हुआ हो।

  • जब आज्ञा का पालन करने से मन को शांति मिलती हो।

  • जब नियमित पूजा और भक्ति से आनंद अनुभव होता हो।

  • जब अच्छे मार्ग पर चलने से जीवन स्थिर बनता हो।

  • जब भगवान की बात मानने से घर का वातावरण अच्छा बनता हो।

  • जब गलत कार्य करने के बाद भीतर से अशांति अनुभव होती हो।

  • जब सत्संग छोड़ने से दुःख बढ़ता हो।

  • जब आज्ञापालन से मन में निर्भयता आती हो।

  • जब गलत इच्छा के पीछे दौड़ने से क्लेश होता हो।

  • जब भगवान की इच्छा के अनुसार जीने से सुख अनुभव होता हो।

  • जब यह समझाना हो कि “सच्चा सुख आज्ञा में ही है।”


ग.म.३५

ग.म.३५ : संसार में एक कहावत है कि, “यदि मन अच्छा हो तो कठौती में भी गंगा है।” यह कहावत गलत है। कोई कितना भी समाधिनिष्ठ या विचारवान क्यों न हो, यदि वह स्त्री-संग में रहने लगे तो उसका धर्म नहीं टिक सकता। और कोई स्त्री कितनी भी धर्मनिष्ठ क्यों न हो, यदि वह पुरुष-संग में रहने लगे तो उसका धर्म भी नहीं टिक सकता। इसलिए स्त्री और पुरुष परस्पर निकट संग में रहें और फिर भी धर्म सुरक्षित रहे, ऐसी आशा नहीं रखनी चाहिए। इस बात में कोई संदेह नहीं रखना चाहिए।

  • जब गलत मित्रता में अत्यधिक निकटता बढ़ रही हो।

  • जब “हमें कुछ नहीं होगा” ऐसा अति-आत्मविश्वास आ रहा हो।

  • जब विपरीत लिंग के साथ अनावश्यक एकांत में रहते हों।

  • जब ऑनलाइन चैटिंग में मर्यादा पार हो रही हो।

  • जब संबंधों के कारण भक्ति या पढ़ाई प्रभावित हो रही हो।

  • जब अपने चरित्र की रक्षा करनी हो।

  • जब प्रलोभनों से दूर रहना हो।

  • जब कार्यालय या कॉलेज में मर्यादाएँ बनाए रखनी हों।

  • जब सोशल मीडिया पर अनुचित बातचीत हो रही हो।

  • जब मन भटक रहा हो।

  • जब अशुद्ध विचार बढ़ रहे हों।

  • जब “हम केवल मित्र हैं” कहकर निकटता बढ़ रही हो।

  • जब गलत संबंधों के कारण परिवार या जीवन बिगड़ रहा हो।

  • जब नियम और धर्म की रक्षा करनी हो।

  • जब वेब सीरीज़ या रोमांटिक सामग्री के प्रभाव से मन बिगड़ रहा हो।

  • जब निजता के नाम पर अनुचित निकटता बढ़ रही हो।

  • जब ब्रह्मचर्य बनाए रखना हो।

  • जब युवावस्था में आत्म-संयम रखना हो।

  • जब बुरी संगति से बचना हो।

  • जब मन और इन्द्रियों को सुरक्षित रखने की समझ विकसित करनी हो।


कारि.९

कारि.९ : जो भगवान के महिमा को जानता है, वह भगवान के संबंध में आए हुए पशु, पक्षी, वृक्ष और लता आदि को भी देवतुल्य मानता है। तो फिर जो मनुष्य भगवान की भक्ति करते हैं, नियमों का पालन करते हैं और भगवान का नाम-स्मरण करते हैं, उन्हें देवतुल्य माने और उनका अवगुण न ले — इसमें क्या कहना! इसलिए जो भगवान का महिमा समझता है, वह भगवान के भक्तों के साथ वैर नहीं बाँधता; और जो महिमा नहीं समझता, वह भक्तों के साथ वैर बाँध लेता है।

  • जब हरिभक्तों के अवगुण देखने की आदत हो।

  • जब किसी सत्संगी के साथ झगड़ा हो गया हो।

  • जब संत या भक्त के प्रति क्रोध आता हो।

  • जब किसी भक्त की छोटी गलती बहुत बड़ी दिखाई देती हो।

  • जब ईर्ष्या के कारण कोई भक्त बुरा लगने लगे।

  • जब मंदिर के सेवक के साथ मनमुटाव हो गया हो।

  • जब WhatsApp या समूहों में भक्तों की निंदा हो रही हो।

  • जब मन में यह भाव आए कि “इस व्यक्ति में ऐसा क्या विशेष है?”

  • जब सत्संग में अहंकार के टकराव होते हों।

  • जब किसी भक्त का अपमान करने का मन हो।

  • जब भगवान के संबंध वालों का महिमा समझना हो।

  • जब सत्संग की एकता बनाए रखनी हो।

  • जब भक्तों को सम्मान की दृष्टि से देखना सीखना हो।

  • जब मित्रों के बीच किसी भक्त का मज़ाक उड़ाया जा रहा हो।

  • जब किसी संत की कठोर बात सुनकर मन खिन्न हो जाता हो।

  • जब सेवा के दौरान मतभेद हो रहे हों।

  • जब भीतर से नापसंदगी होने पर भी महिमा बनाए रखना हो।

  • जब भक्तद्रोह से बचना हो।

  • जब भगवान को प्रसन्न करने के लिए भक्तों का सम्मान करना हो।

  • जब अच्छे सत्संग संबंध बनाए रखने हों।


ग.प्र.४

ग.प्र.४ : जिस व्यक्ति से ईर्ष्या होती हो, उसके गुणों को ग्रहण करना चाहिए और अपने अवगुणों का त्याग करना चाहिए। और यदि ऐसा न हो तथा ईर्ष्या के कारण भगवान के भक्तों का द्रोह होने लगे, तो ऐसी ईर्ष्या का भगवान के भक्त को हर प्रकार से त्याग कर देना चाहिए।

  • जब मित्र की सफलता देखकर भीतर जलन होती हो।

  • जब दूसरे अधिक अंक प्राप्त करते हों।

  • जब किसी की सेवा या प्रशंसा अधिक हो रही हो।

  • जब सोशल मीडिया पर दूसरों का अच्छा जीवन देखकर ईर्ष्या होती हो।

  • जब सत्संग में कोई आगे बढ़ रहा हो।

  • जब मन में यह विचार आता हो कि “उसे ही सब कुछ क्यों मिलता है?”

  • जब किसी की प्रतिभा देखकर वह अच्छा न लगता हो।

  • जब तुलना के कारण मन दुःखी होता हो।

  • जब किसी भक्त की लोकप्रियता देखकर चिढ़ होती हो।

  • जब किसी मित्र के पास अधिक धन या सुविधाएँ हों।

  • जब ईर्ष्या के कारण संबंध बिगड़ रहे हों।

  • जब दूसरों के गुणों से सीखना हो।

  • जब अपने अवगुणों को पहचानना हो।

  • जब ईर्ष्या को प्रेरणा में बदलना हो।

  • जब भीतर की प्रतिस्पर्धा और द्वेष दूर करना हो।

  • जब दूसरों की उन्नति पर प्रसन्न होना सीखना हो।

  • जब ईर्ष्या के कारण निंदा करने की आदत हो।

  • जब टीम में सामंजस्य बनाए रखना हो।

  • जब भक्तद्रोह से बचना हो।

  • जब सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना हो।


ग.प्र.५८

ग.प्र.५८ : पक्का हरिभक्त बनने का उपाय यही है कि भगवान के दासों का भी दास बनकर रहे और ऐसा माने कि, “सभी भक्त महान हैं और मैं सबसे छोटा हूँ।” इस प्रकार स्वयं को हरिभक्तों का दासानुदास मानकर रहना चाहिए।

  • जब अहंकार बढ़ गया हो।

  • जब मन में यह भाव आता हो कि “मैं ही बड़ा हूँ।”

  • जब सेवा करने के बाद सम्मान की अपेक्षा रखते हों।

  • जब सत्संग में अहंकार का टकराव होता हो।

  • जब छोटी सेवा करना अच्छा न लगता हो।

  • जब दूसरे भक्तों को अपने से छोटा मानते हों।

  • जब प्रशंसा न मिलने पर मन दुःखी हो जाता हो।

  • जब नेतृत्व में विनम्रता बनाए रखनी हो।

  • जब मन में यह भाव आता हो कि “मेरे बिना कुछ नहीं चल सकता।”

  • जब संत या भक्त की बात स्वीकार करना कठिन लगता हो।

  • जब दासभाव सीखना हो।

  • जब सेवा द्वारा मन को विनम्र बनाना हो।

  • जब ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा कम करनी हो।

  • जब भक्तों के गुण देखने की आदत डालनी हो।

  • जब सम्मान देकर संबंध मजबूत करने हों।

  • जब टीमवर्क में सामंजस्य बनाए रखना हो।

  • जब क्रोध और टकराव कम करना हो।

  • जब सच्चा सत्संगी दृष्टिकोण लाना हो।

  • जब भगवान को प्रसन्न करने के लिए विनम्रता रखनी हो।

  • जब भीतर की “मैं” भावना को कम करना हो।

ग.अं.६

ग.अं.६ : जीवमात्र का ऐसा स्वभाव होता है कि जब उससे कोई गलती होती है, तो वह कहता है कि “मुझे किसी और ने भ्रमित किया था, इसलिए मुझसे गलती हो गई, मेरी कोई गलती नहीं है।” परंतु ऐसा कहने वाला अत्यंत मूर्ख है। क्योंकि यदि कोई व्यक्ति उसे कहे कि “तुम कुएँ में कूद जाओ,” तो क्या वह कहने मात्र से कुएँ में कूद जाएगा? इसलिए गलती तो करने वाले की ही होती है, वह दूसरों पर दोष डालता है। इसी प्रकार इन्द्रियों और अंतःकरण पर दोष डालना भी जीव की मूर्खता है।

  • जब अपनी गलती के लिए दूसरों को दोष दिया जाता हो।

  • जब परीक्षा में असफल होने के बाद बहाने बनाए जाते हों।

  • जब “दोस्तों ने बिगाड़ दिया” कहकर जिम्मेदारी टाली जाती हो।

  • जब मोबाइल की लत के लिए दूसरों को दोष दिया जाता हो।

  • जब क्रोध करने के बाद कहा जाता हो कि “उसकी वजह से हुआ।”

  • जब गलत निर्णय लेकर बाद में पछतावा होता हो।

  • जब अपनी कमजोरी स्वीकार करना कठिन लगता हो।

  • जब अनुशासन की कमी के लिए परिस्थितियों को दोष दिया जाता हो।

  • जब बुरी आदतों के लिए संगति को ही जिम्मेदार माना जाता हो।

  • जब गलती के बाद आत्म-सुधार करना हो।

  • जब जिम्मेदारी लेने की आदत विकसित करनी हो।

  • जब victim mindset छोड़ना हो।

  • जब यह समझना हो कि “मेरे अंदर भी दोष है।”

  • जब अपनी गलती को ईमानदारी से स्वीकार करना हो।

  • जब रिश्तों में हर दोष सामने वाले पर डाला जाता हो।

  • जब लगातार बहाने बनाने की आदत हो।

  • जब आत्म-नियंत्रण विकसित करना हो।

  • जब अपने अवगुण सुधारने पर ध्यान देना हो।

  • जब परिपक्वता (maturity) और जिम्मेदारी विकसित करनी हो।

  • जब जीवन में growth mindset लाना हो।


सारं.१८

सारं.१८ : मूर्ख व्यक्ति जब परेशान होता है, तो या तो सो जाता है, या रोता है, या किसी से झगड़ा करता है, या उपवास कर लेता है — इस प्रकार दुःख को टालने का प्रयास करता है। और ऐसा करते-करते यदि बहुत अधिक परेशान हो जाए तो मर भी सकता है। इस प्रकार मूर्ख व्यक्ति शोक को दूर करने का प्रयास करता है, परंतु उससे न तो दुःख दूर होता है और न ही उसका स्वभाव बदलता है। लेकिन जो समझदार होता है, वह समझदारी से शोक को दूर करता है और इसलिए वही सुखी होता है।

  • जब तनाव आने पर पूरा दिन सोते रहते हों।

  • जब दुःख में लगातार रोते रहते हों।

  • जब तनाव में सब से झगड़ा करते हों।

  • जब गुस्से में खाना छोड़ देते हों।

  • जब समस्याओं से भागने की आदत हो।

  • जब overthinking के कारण मानसिक तनाव बढ़ता हो।

  • जब heartbreak के बाद पूरी तरह निराश हो जाते हों।

  • जब छोटी बात पर अत्यधिक प्रतिक्रिया देते हों।

  • जब depression जैसी स्थिति में self-harm के विचार आते हों।

  • जब समस्या में समझदारी से सोचना हो।

  • जब भावनाओं को नियंत्रित करना सीखना हो।

  • जब solution-oriented mindset रखना हो।

  • जब दुःख में धैर्य रखना हो।

  • जब impulsive निर्णय रोकने हों।

  • जब stress management सीखना हो।

  • जब परिवार या दोस्तों पर गुस्सा आता हो।

  • जब जीवन की समस्याओं को परिपक्वता से संभालना हो।

  • जब मन स्थिर रखना हो।

  • जब रोने या गुस्से की जगह समझदारी से काम लेना हो।

  • जब कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मक और व्यवहारिक रहना हो।


ग.प्र.७૦

ग.प्र.७૦ : सत्संग करना अपने आत्मकल्याण के लिए ही करना चाहिए, किसी भी सांसारिक वस्तु की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। क्योंकि जैसे घर में दस लोग हों और उनमें से सभी का नाश होने वाला हो, और उनमें से यदि एक भी बच जाए तो वह बहुत है; वैसे ही संसार की सब चीजें नाशवान हैं और उनमें से थोड़ा भी बच जाए तो बहुत है। इसलिए यह समझना चाहिए कि जो कुछ भी बच गया वही बहुत है। और यदि अत्यंत दुःख आने वाला हो, तो भगवान का आश्रय लेने से वह कुछ कम भी हो सकता है। लेकिन जीव यह बात नहीं समझ पाता। और यदि भाग्य में शूल लिखा हो, तो भी वह कांटे से टल सकता है — इतना अंतर भी संभव है।

  • जब भगवान को केवल अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए भजा जाता हो।

  • जब “भक्ति कर रहा हूँ फिर भी समस्या क्यों?” ऐसा प्रश्न आता हो।

  • जब बड़ी विपत्ति से थोड़ा बच गए हों।

  • जब दुर्घटना में जान बच गई हो।

  • जब नुकसान कम हुआ हो।

  • जब अपेक्षित लाभ न मिलने पर श्रद्धा डगमगाती हो।

  • जब भगवान को एक deal की तरह देखा जाता हो।

  • जब दुःख कम होने पर भी शिकायत रहती हो।

  • जब “मुझे सब कुछ perfect चाहिए” ऐसा भाव हो।

  • जब भगवान का आश्रय केवल कल्याण के लिए करना हो।

  • जब कठिनाइयों में भी gratitude रखना हो।

  • जब यह समझना हो कि “कम भी बहुत है।”

  • जब भक्ति में स्वार्थ छिपा हो।

  • जब इच्छा पूरी न होने पर निराशा आती हो।

  • जब छोटी कृपा भी न दिखाई देती हो।

  • जब यह समझना हो कि भगवान दुःख को कम करते हैं।

  • जब भक्ति का उद्देश्य आत्मकल्याण बनाना हो।

  • जब शिकायत की जगह कृतज्ञता लानी हो।

  • जब कठिन समय में भगवान का सहारा मजबूत रखना हो।

  • जब faith को worldly expectations से अलग रखना हो।

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