प्रश्न : रवि १२वीं कक्षा में पढ़ता था। बोर्ड परीक्षा निकट होने के बावजूद वह मित्रों के साथ घूमने और मोबाइल पर बहुत समय बिताता था। परीक्षा का परिणाम आने पर उसके अंक बहुत कम आए। घर पर सभी ने कारण पूछा। रवि तुरंत कहने लगा कि उसके मित्र उसे लगातार बाहर बुलाते थे, इसलिए वह पढ़ाई नहीं कर पाया। यदि उसके मित्र अच्छे होते तो उसके अंक भी अच्छे आते। वह अपनी गलतियों के बारे में सोचने के बजाय पूरा दोष अपने मित्रों पर डाल रहा था।
प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में रवि को क्या सोचना चाहिए?
ग.अं.६ :
"जीवमात्र का ऐसा स्वभाव है कि जब उसमें कोई दोष आता है तब वह कहता है, ‘मुझे किसी दूसरे ने बहकाया इसलिए मुझसे भूल हुई, परंतु मुझमें कोई दोष नहीं है।’ परंतु ऐसा कहने वाला महामूर्ख है। यदि कोई कहे कि ‘कुएँ में गिर जा’, तो क्या उसके कहने से कुएँ में गिर जाना चाहिए? इसलिए दोष तो उसी का है जो ऐसा करता है और दूसरे पर दोष डालता है। इसी प्रकार इन्द्रियों और अंतःकरण का दोष निकालना भी जीव की मूर्खता है।"
उत्तर :
रवि को मित्रों पर दोष लगाने के बजाय अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। पढ़ाई न करना उसकी अपनी भूल थी। उसे अपने अवगुणों को पहचानकर सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
प्रश्न : जयदीप कॉलेज में पढ़ता था। उसे अपने समाज और परिवार की परंपराओं पर बहुत गर्व था। धीरे-धीरे उसके मन में यह भाव आने लगा कि उसकी जाति और समाज दूसरों से श्रेष्ठ हैं।
प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में जयदीप को क्या सोचना चाहिए?
ग.अं.३९ :
"अपने को देह से पृथक आत्मा जानना चाहिए। वह आत्मा ब्राह्मण नहीं है, क्षत्रिय नहीं है, कणबी नहीं है, किसी का पुत्र नहीं है, किसी का पिता नहीं है। उसकी कोई जाति नहीं है, कोई नात नहीं है। वह आत्मा सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी तथा ज्ञानयुक्त है।"
उत्तर :
जयदीप को सोचना चाहिए कि आत्मा की कोई जाति या समाज नहीं होता। इसलिए अपनी जाति या समाज का अहंकार नहीं रखना चाहिए और सभी को समान दृष्टि से देखना चाहिए।
प्रश्न : राकेश कई वर्षों से युवक मंडल में सेवा करता था। वह विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करता और अनेक सेवाओं में आगे रहता था। धीरे-धीरे लोग उसकी प्रशंसा करने लगे। अब जब कोई उसकी सलाह के बिना निर्णय लेता, तो उसे बुरा लगता। यदि कोई दूसरा युवक अच्छी सेवा करे और उसकी प्रशंसा हो, तो राकेश को भीतर से अच्छा नहीं लगता।
प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में राकेश को क्या सोचना चाहिए?
ग.प्र.५८ :
"पक्का हरिभक्त बनने का उपाय यही है कि परमेश्वर के दास का भी दास बनकर रहे और ऐसा माने कि ‘सभी भक्त मुझसे बड़े हैं और मैं सबसे छोटा हूँ।’ इस प्रकार हरिभक्तों का दासानुदास बनकर रहे।"
उत्तर :
राकेश को अहंकार छोड़कर सोचना चाहिए कि सभी हरिभक्त महान हैं और मैं सबसे छोटा हूँ। सेवा और सफलता भगवान की कृपा से प्राप्त होती है। इसलिए उसे नम्रता बनाए रखनी चाहिए।
प्रश्न : युवक मंडल के एक कार्यक्रम के लिए पाँच युवकों की टीम बनाई गई। सभी को अलग-अलग जिम्मेदारियाँ दी गई थीं। टीम में दर्शन नाम का एक युवक बहुत व्यवस्थित और कुशल था, इसलिए उसकी सलाह अधिक मानी जाती थी। धीरे-धीरे कुछ युवकों को लगने लगा कि दर्शन को अधिक महत्व दिया जा रहा है।
प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में टीम के सदस्यों को क्या सोचना चाहिए?
ग.प्र.४ :
"जिसके प्रति ईर्ष्या हो उसके गुणों को ग्रहण करना चाहिए और अपने अवगुणों का त्याग करना चाहिए। यदि ऐसा न हो और ईर्ष्या के कारण भगवान के भक्त का द्रोह होने लगे, तो ऐसी ईर्ष्या का भगवान के भक्त को सर्व प्रकार से त्याग कर देना चाहिए।"
उत्तर :
टीम के सदस्यों को दर्शन की सफलता या कुशलता देखकर ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। उसके अच्छे गुणों को सीखना चाहिए और अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इससे टीम की एकता और उत्साह बना रहेगा।
प्रश्न : मीनाबेन के परिवार का एक दिन गंभीर सड़क दुर्घटना हो गया। गाड़ी को बहुत नुकसान हुआ, लेकिन सौभाग्य से परिवार के सभी सदस्यों को केवल सामान्य चोटें आईं। अस्पताल से घर आने के बाद परिवार के कुछ लोग लगातार यही बात करते रहे कि गाड़ी का बहुत नुकसान हो गया, यात्रा खराब हो गई और कितनी परेशानी हुई। मीनाबेन भी इन्हीं बातों को सोचकर दुखी रहने लगीं।
प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में मीनाबेन को क्या सोचना चाहिए?
ग.प्र.७० :
"सत्संग अपने जीव के कल्याण के लिए करना चाहिए, किसी वस्तु की इच्छा के लिए नहीं। यदि घर के दस व्यक्तियों में से मृत्यु के समय एक भी बच जाए तो क्या वह कम है? या जिसे केवल सूखी रोटी मिलने वाली थी, उसे यदि भोजन मिल जाए तो क्या वह कम है? जो सब नष्ट होने वाला था उसमें से जितना बच गया, वह बहुत है — ऐसा मानना चाहिए। अत्यधिक दुःख आने वाला हो तो परमेश्वर का आश्रय करने से वह कुछ कम हो जाता है। यदि शूली लिखी हो तो वह काँटे से टल जाए, इतना भी बड़ा लाभ है।"
उत्तर :
मीनाबेन को सोचना चाहिए कि भगवान की कृपा से पूरा परिवार सुरक्षित बच गया, यही सबसे बड़ा लाभ है। हुए नुकसान की बजाय भगवान के उपकार, संरक्षण और बची हुई सुखद स्थिति का विचार करना चाहिए। दुःख के समय भगवान का आश्रय लेने से मन को शांति मिलती है और दुःख सहने की शक्ति प्राप्त होती है।


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