वचनामृत मौखिक प्रश्नोत्तर -Practice Text -2- Solution

 

प्रश्न :

किरणबेन के पुत्र को पिछले कुछ समय से बार-बार स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हो रही थीं। डॉक्टर का उपचार चल रहा था, लेकिन सुधार धीरे-धीरे हो रहा था। इस दौरान रिश्तेदार और पड़ोस के कुछ लोग उन्हें तरह-तरह की सलाह देने लगे। कोई कहता कि किसी विशेष स्थान पर धागा बंधवाओ, तो कोई कहता कि कोई विशेष विधि करवाओ। कुछ लोग तो यह भी कहते कि यदि यह उपाय नहीं किए गए तो समस्या और बढ़ जाएगी। किरणबेन उलझन में पड़ गईं। एक ओर लोगों का लगातार दबाव था और दूसरी ओर उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि सही क्या है।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में किरणबेन को क्या सोचना चाहिए?

वचनामृत गढ़डा मध्य ३८ :

"संसारी जीव को यदि कोई धन देने वाला मिले या पुत्र देने वाला मिले तो उसमें तुरंत प्रतीति हो जाती है; परंतु भगवान के भक्त को तो जंत्र-मंत्र में कहीं भी प्रतीति नहीं होती। और जो हरिभक्त जंत्र-मंत्र में प्रतीति करता है, वह सत्संगी होकर भी आधा विमुख जानना।"

उत्तर :

किरणबेन को सोचना चाहिए कि भगवान के भक्त को जंत्र-मंत्र, धागे-दोरे या अंधविश्वास में विश्वास नहीं रखना चाहिए। भगवान पर दृढ़ श्रद्धा रखकर उचित चिकित्सा करवानी चाहिए और भगवान के आश्रय में रहना चाहिए।


प्रश्न :

विशाल एक निजी कंपनी में काम करता था। वह मेहनती और शांत स्वभाव का था। एक दिन ऑफिस की मीटिंग के दौरान उसके एक सहकर्मी ने सभी के सामने उसकी गलती के बारे में कठोर टिप्पणी कर दी। विशाल को बहुत दुःख हुआ। मीटिंग समाप्त होने के बाद भी वह बार-बार उसी बात के बारे में सोचता रहा। उसे लग रहा था कि सबके सामने उसका सम्मान कम हो गया। अगले दिन भी वह उसी घटना को याद करके दुखी होता रहा। अब उसके मन में काम से अधिक उस अपमान के विचार ही आते रहते थे।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में विशाल को क्या सोचना चाहिए?

वचनामृत सारंगपुर १८ :

"मूर्ख जब उलझन में पड़ता है तो कभी सोता रहता है, कभी रोता है, कभी किसी से झगड़ता है और कभी उपवास करता है। इन चार प्रकार से वह अपनी उलझन दूर करने का उपाय करता है। परंतु ऐसा करने से दुःख दूर नहीं होता और स्वभाव भी नहीं जाता। यदि समझदारी से विचार करे तो दुःख और स्वभाव दोनों दूर हो जाते हैं। इसलिए समझदार ही सुखी होता है।"

उत्तर :

विशाल को अपमान की बात को बार-बार याद करके दुःखी नहीं होना चाहिए। उसे समझदारी से विचार करना चाहिए, अपनी भूल सुधारनी चाहिए और मन को शांत रखना चाहिए। विवेकपूर्वक सोचने से दुःख दूर हो जाता है।


प्रश्न :

हार्दिक युवक मंडल में नियमित सेवा करता था। एक बड़े कार्यक्रम के दौरान उसने कई दिनों तक जल्दी आकर व्यवस्था, सफाई और अन्य आवश्यक सेवाएँ कीं। कार्यक्रम बहुत सफल रहा। अंत में कुछ सेवकों का नाम लेकर सार्वजनिक रूप से उनका धन्यवाद किया गया, लेकिन हार्दिक का नाम नहीं लिया गया। इस बात से उसे भीतर से दुःख हुआ। घर जाते समय भी वह यही सोचता रहा कि मैंने इतनी मेहनत की, फिर भी किसी ने मेरी सेवा पर ध्यान नहीं दिया। अब उसका सेवा करने का उत्साह भी थोड़ा कम होने लगा।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में हार्दिक को क्या सोचना चाहिए?

वचनामृत गढ़डा मध्य ४१ :

"जिसे परमेश्वर का भजन करना हो, उसे भगवान अथवा भगवान के भक्त की सेवा-चाकरी मिले तो उसे अपना बड़ा भाग्य मानकर सेवा करनी चाहिए। वह भी भगवान की प्रसन्नता और अपने कल्याण के लिए करनी चाहिए, किसी के प्रशंसा करने के लिए नहीं।"

उत्तर :

हार्दिक को सोचना चाहिए कि सेवा भगवान को प्रसन्न करने के लिए करनी चाहिए, प्रशंसा पाने के लिए नहीं। सेवा करने का अवसर मिलना ही बहुत बड़ा सौभाग्य है। इसलिए बिना अपेक्षा के सेवा करते रहना चाहिए।


प्रश्न :

निशा कॉलेज में पढ़ती थी। उसके मित्र कई बार जल्दबाज़ी में निर्णय लेते और बाद में पछताते थे। कोई सोशल मीडिया देखकर कोई वस्तु खरीद लेता, तो कोई मित्रों की बातों में आकर गलत निर्णय ले लेता। कई बार निशा भी दूसरों को देखकर तुरंत निर्णय ले लेती थी। बाद में उसे समझ आता कि बिना सोचे-समझे लिए गए निर्णय के कारण समस्या खड़ी हो गई। अब वह चाहती थी कि जीवन में अधिक समझदारी से आगे बढ़े और सही-गलत का विचार करके निर्णय ले।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में निशा को क्या सोचना चाहिए?

वचनामृत गढ़डा प्रथम १६ :

"जिस भगवान के भक्त को सत्-असत का विवेक होता है, वह अपने अवगुणों को पहचानकर उनका त्याग कर देता है। जो अच्छा विचार हो उसे ग्रहण करता है और जो बुरा विचार हो उसका त्याग करता है।"

उत्तर :

निशा को हर निर्णय से पहले सही और गलत का विचार करना चाहिए। अच्छे विचारों को अपनाना चाहिए और गलत विचारों का त्याग करना चाहिए। विवेकपूर्ण निर्णय जीवन को सफल बनाते हैं।


प्रश्न :

आर्यन कॉलेज में पढ़ता था। वह एक होशियार और संस्कारी युवक था, लेकिन युवावस्था में उसे अनेक नए आकर्षणों और प्रलोभनों का सामना करना पड़ रहा था। उसके कुछ मित्र लगातार रोमांटिक चर्चाएँ करते, सोशल मीडिया पर अनुचित सामग्री साझा करते और संबंधों को जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बात के रूप में प्रस्तुत करते थे। शुरुआत में आर्यन इन सब से दूर रहने का प्रयास करता था, लेकिन धीरे-धीरे उसके मन में भी ऐसे विचार बढ़ने लगे। अब पढ़ाई, करियर और भक्ति की अपेक्षा उसका ध्यान बार-बार इन बातों की ओर जाने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपने मन को स्थिर और संयमित कैसे रखे।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में आर्यन को क्या सोचना चाहिए?

वचनामृत गढ़डा मध्य ३५ :

"चाहे कोई कितना भी समाधिनिष्ठ या विचारवान हो, यदि वह स्त्री-पुरुष के अनुचित प्रसंगों में रहने लगे तो उसका धर्म नहीं रह सकता। इसलिए ऐसे प्रसंगों से दूर रहना चाहिए।"

उत्तर :

आर्यन को सोचना चाहिए कि अनुचित संग और विषयों से मन भक्ति, अध्ययन और जीवन के लक्ष्य से भटक जाता है। इसलिए उसे संयम रखना चाहिए, कु-संग से दूर रहना चाहिए और अपने मन को भक्ति तथा अच्छे विचारों में लगाना चाहिए।


प्रश्न :

विनय नियमित रूप से युवक मंडल में आता था। एक दिन सेवा के दौरान उसका एक हरिभक्त के साथ मतभेद हो गया। शुरुआत में बात सामान्य थी, लेकिन धीरे-धीरे विनय के मन में उस हरिभक्त के प्रति नाराज़गी बढ़ने लगी। अब जब भी वह हरिभक्त कोई सेवा करता या कोई उसकी प्रशंसा करता, तो विनय को अच्छा नहीं लगता था। वह उसके गुणों को देखने के बजाय उसकी गलतियाँ ढूँढ़ने लगा। मित्रों के साथ बातचीत में भी वह उसकी आलोचना करने लगा। समय के साथ उसका क्रोध और द्वेष बढ़ता गया।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में विनय को क्या सोचना चाहिए?

स्वामीनी वातो (कारीयाणी ९) :

"जो भगवान का महिमा समझता है, वह भगवान के भक्तों को देवतुल्य मानता है और उनके अवगुण नहीं लेता। जो महिमा नहीं समझता वही भगवान के भक्तों से वैर बाँधता है।"

उत्तर :

विनय को हरिभक्त के अवगुण देखने के बजाय उनके गुण देखने चाहिए। भगवान के भक्त के प्रति द्वेष या वैर नहीं रखना चाहिए। महिमा समझकर सभी के प्रति सद्भाव रखना चाहिए।


प्रश्न :

मयंक एक मेहनती युवक था। पिछले कुछ महीनों से उसके जीवन में एक के बाद एक कठिनाइयाँ आ रही थीं। पहले उसकी नौकरी चली गई। उसके बाद घर के एक सदस्य की तबीयत खराब हो गई। नई नौकरी के लिए उसने कई जगह प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसी दौरान उसके कुछ करीबी मित्रों के साथ भी मतभेद हो गए। मयंक को लगने लगा कि उसके जीवन में कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है। वह बार-बार सोचता कि मेरे साथ ही इतनी सारी समस्याएँ क्यों आ रही हैं? धीरे-धीरे वह निराश और हताश होने लगा। उसे लगने लगा कि अब आगे क्या होगा, इसकी कोई उम्मीद नहीं है।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में मयंक को क्या सोचना चाहिए?

वचनामृत गढ़डा मध्य ६२ :

"भगवान के भक्त को जो भी दुःख आता है, वह काल, कर्म या माया से नहीं आता। भगवान स्वयं अपने भक्त की धैर्यशक्ति देखने के लिए दुःख भेजते हैं। यह भगवान की इच्छा है, ऐसा जानकर भक्त को प्रसन्न रहना चाहिए।"

उत्तर :

मयंक को सोचना चाहिए कि भगवान कभी-कभी अपने भक्त की धैर्य और श्रद्धा की परीक्षा लेते हैं। कठिनाइयों के समय निराश होने के बजाय भगवान पर विश्वास रखकर धैर्यपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए।


प्रश्न :

रमेशभाई एक छोटी दुकान चलाते थे। पिछले कुछ समय से उनकी आय कम हो गई थी। घर के खर्च और बच्चों की पढ़ाई में ही अधिकांश पैसे खर्च हो जाते थे। मंदिर में उत्सव और विभिन्न सेवाओं के दौरान वे देखते कि कई हरिभक्त बड़ी राशि की सेवा करते और सुंदर भेंट अर्पित करते थे। रमेशभाई की भी भगवान के लिए कुछ करने की इच्छा थी, लेकिन अपनी आर्थिक स्थिति देखकर वे सोचते कि उनके पास अर्पण करने के लिए कुछ विशेष नहीं है। धीरे-धीरे उनके मन में संकोच आने लगा।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में रमेशभाई को क्या सोचना चाहिए?

वचनामृत गढ़डा अन्त्य २५ :

"भगवान की प्रसन्नता केवल अधिक उपहार अर्पण करने वालों पर ही होती है ऐसा नहीं है। यदि कोई गरीब श्रद्धा सहित जल, पत्र, फल या फूल भी अर्पण करे तो भगवान उससे भी प्रसन्न होते हैं।"

उत्तर :

रमेशभाई को सोचना चाहिए कि भगवान वस्तु का मूल्य नहीं देखते, बल्कि भाव और श्रद्धा देखते हैं। सच्चे प्रेम और भक्ति से की गई छोटी सेवा भी भगवान को अत्यंत प्रिय होती है।


प्रश्न :

प्रतीक एक निजी कंपनी में काम करता था। वह कई बार अपना काम समय पर पूरा नहीं कर पाता था। जब अधिकारी उससे काम के बारे में पूछते, तो वह कभी ट्रैफिक का कारण बताता, कभी अधिक काम होने की बात कहता और कभी अन्य सहकर्मियों को जिम्मेदार ठहराता। लगभग हर गलती के लिए उसके पास कोई न कोई बहाना तैयार रहता था। धीरे-धीरे उसकी कार्यक्षमता पर असर पड़ने लगा, लेकिन वह यह सोचने के लिए तैयार नहीं था कि उसे स्वयं में सुधार करने की आवश्यकता है।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में प्रतीक को क्या सोचना चाहिए?

वचनामृत गढ़डा अन्त्य ६ :

"जीव का स्वभाव ऐसा है कि जब उसमें कोई दोष आता है तो वह कहता है कि मुझे किसी और ने भटका दिया, मेरी कोई गलती नहीं है। परंतु ऐसा कहने वाला महामूर्ख है। दोष उसी का है जो ऐसा करता है, दूसरे पर दोष डालना मूर्खता है।"

उत्तर :

प्रतीक को दूसरों पर दोष डालने के बजाय अपनी गलतियों को स्वीकार करना चाहिए। बहाने बनाने के स्थान पर आत्मचिंतन करना चाहिए और स्वयं में सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए। तभी वास्तविक प्रगति संभव है।

0 comments

પ્રેક્ટિસ ટેસ્ટ - 2 -Solution

  પ્રશ્ન: મરેલી ઘોડીને જીવતી કરનાર કોણ હતા? વિકલ્પો: A. મુક્તાનંદ સ્વામી B. વ્યાપકાનંદ સ્વામી C. સ્વરૂપાનંદ સ્વામી D. ગોપાળાનંદ સ્વામી સાચો...