वचनामृत मौखिक प्रश्नोत्तर -Practice Text -3 -solution

 

प्रश्न :

हितेश नियमित रूप से युवक मंडल में सेवा करता था। एक दिन एक कार्यक्रम के दौरान हुई एक गलती के लिए कुछ लोग उसे जिम्मेदार मानने लगे। वास्तव में वह गलती उसकी नहीं थी, फिर भी कई लोग उसके बारे में गलत बातें करने लगे। कुछ मित्रों ने भी उसकी बात सुने बिना ही उसके बारे में धारणा बना ली। इस बात से हितेश को बहुत दुःख हुआ। उसे लगने लगा कि मैंने कोई गलती की ही नहीं, फिर भी लोग मुझे गलत समझ रहे हैं। वह दिनभर इसी बारे में सोचता रहता और उसके मन में बार-बार प्रश्न उठता कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में हितेश को क्या सोचना चाहिए?

ग.म.६२ :

"भगवान के भक्त को जो भी दुःख प्राप्त होता है, वह काल, कर्म या माया के कारण नहीं होता। भगवान स्वयं अपने भक्त की धीरज देखने के लिए ऐसी परिस्थिति आने देते हैं।"

उत्तर :

हितेश को ऐसा सोचना चाहिए कि मेरे जीवन में जो यह परिस्थिति आई है, वह भगवान की इच्छा के बिना नहीं आई है। लोग मुझे गलत समझें या मेरी निंदा करें, फिर भी भगवान मेरी धैर्य और निष्ठा को देख रहे हैं। इसलिए दुःखी होने के बजाय भगवान पर विश्वास रखकर शांतिपूर्वक सत्संग और सेवा में लगे रहना चाहिए।


प्रश्न :

मीत कॉलेज में पढ़ता था। पिछले कुछ समय से उसकी एक लड़की के साथ बहुत निकट मित्रता हो गई थी। उसका ध्यान पढ़ाई और सत्संग से हटने लगा। उलझन महसूस होने पर उसने महंत स्वामी महाराज को पत्र लिखा। उत्तर में उसे पढ़ाई पर ध्यान देने, मर्यादा बनाए रखने और भविष्य को ध्यान में रखकर निर्णय लेने का मार्गदर्शन मिला। शुरुआत में उसने उस बात को माना, लेकिन कुछ समय बाद उसने सोचा कि मेरी परिस्थिति अलग है और मैं सब संभाल लूँगा। धीरे-धीरे उस संबंध में मतभेद बढ़ने लगे। अब उसकी पढ़ाई, मानसिक शांति और परिवार के साथ संबंधों पर भी असर पड़ने लगा।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में मीत को क्या सोचना चाहिए?

ग.म.३५ :

"चाहे कोई कितना भी विचारवान या समाधिनिष्ठ क्यों न हो, यदि वह स्त्री-पुरुष के अनुचित प्रसंग में रहने लगे तो उसका धर्म नहीं रह सकता।"

उत्तर :

मीत को समझना चाहिए कि गुरु द्वारा दिया गया मार्गदर्शन उसके कल्याण के लिए था। अपनी बुद्धि पर अधिक भरोसा करके मर्यादा का उल्लंघन करने के कारण ही उसे दुःख और उलझन का अनुभव हुआ। इसलिए अब उसे गुरु की आज्ञा के अनुसार चलना चाहिए, मर्यादा बनाए रखनी चाहिए तथा पढ़ाई और सत्संग में मन लगाना चाहिए।


प्रश्न :

हार्दिक नियमित रूप से युवक मंडल में आता था और सेवाओं में भी उत्साह से जुड़ता था। लेकिन उसका एक स्वभाव था कि यदि कोई उसकी बात न माने या उसकी गलती बताए, तो उसे तुरंत बुरा लग जाता था। एक दिन उसने अपने इस स्वभाव के बारे में एक वरिष्ठ संत से पूछा। संत ने प्रेमपूर्वक समझाया कि उसे क्रोध और अहंकार छोड़कर नम्रता विकसित करनी चाहिए। साथ ही उन्होंने उसकी कुछ गलतियाँ भी बताईं और स्वभाव सुधारने की सलाह दी।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में हार्दिक को क्या सोचना चाहिए?

ग.प्र.१६ :

"जिस भक्त को सत्-असत का विवेक होता है, वह अपने दोषों को पहचानकर उनका त्याग कर देता है।"

उत्तर :

हार्दिक को ऐसा सोचना चाहिए कि संत ने उसकी निंदा करने के लिए नहीं, बल्कि उसके कल्याण के लिए उसकी गलतियाँ बताई हैं। समझदार व्यक्ति अपने दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करता है। इसलिए संत के प्रति मन में दुःख रखने के बजाय उसे अपने स्वभाव को सुधारने का प्रयास करना चाहिए।


प्रश्न :

मीत युवक मंडल में बहुत सक्रिय था। कोई भी सेवा हो, वह उत्साह से आगे आता था। समय के साथ उसे लगने लगा कि अनेक सेवाएँ उसके कारण ही अच्छी तरह चलती हैं। जब कोई कार्यक्रम सफल होता, तो उसके मन में विचार आता कि मेरे बिना यह कार्य संभव ही नहीं था।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में मीत को क्या सोचना चाहिए?

ग.प्र.५८ :

"पक्का हरिभक्त बनने का उपाय यही है कि भगवान के भक्तों का दासानुदास बनकर रहे और स्वयं को सबसे छोटा माने।"

उत्तर :

मीत को ऐसा सोचना चाहिए कि कोई भी सेवा उसकी शक्ति से नहीं, बल्कि भगवान और गुरु की कृपा से सफल होती है। उसे स्वयं को दूसरों से बड़ा नहीं मानना चाहिए। दासानुदास का भाव रखने से अहंकार दूर होगा और सच्ची भक्ति विकसित होगी।


प्रश्न :

आकाश एक निजी कंपनी में काम करता था। अचानक कंपनी ने कर्मचारियों की संख्या कम करने का निर्णय लिया और उसकी नौकरी चली गई। यह समाचार सुनकर वह बहुत निराश हो गया। शुरुआती कुछ दिनों तक वह अधिकांश समय बिस्तर पर ही पड़ा रहता। कभी अकेले बैठकर अपनी परिस्थिति पर दुःखी होता और कभी परिवार के लोगों से चिड़चिड़ेपन से बात करता।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में आकाश को क्या सोचना चाहिए?

सारं.१८ :

"मूर्ख व्यक्ति जब उलझन में पड़ता है तो रोता है, सोता है या दूसरों से झगड़ता है; परंतु इससे दुःख दूर नहीं होता। समझदारी से विचार करने पर ही दुःख और स्वभाव दोनों दूर होते हैं।"

उत्तर :

आकाश को समझना चाहिए कि निराश होकर पड़े रहना, रोना या दूसरों पर चिड़ना समस्या का समाधान नहीं है। उसे समझदारी से विचार करके नई नौकरी के लिए प्रयास करना चाहिए, भगवान का आश्रय रखना चाहिए और हिम्मत के साथ आगे बढ़ना चाहिए।


प्रश्न :

हर्ष कई वर्षों से सत्संग कर रहा था। वह नियमित सभा में आता, पूजा भी करता और सेवाओं में भी जुड़ा रहता था। फिर भी उसे लगता था कि उसके जीवन में कोई विशेष आंतरिक प्रगति नहीं हो रही है। छोटी-छोटी बातों पर उसे अभी भी क्रोध आ जाता, कभी ईर्ष्या होती और कोई उसकी आलोचना करे तो उसका मन दुःखी हो जाता।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में हर्ष को क्या सोचना चाहिए?

ग.प्र.१६ :

"जिस भक्त को सत्-असत का विवेक होता है, वह अपने दोषों को पहचानकर उनका त्याग कर देता है।"

उत्तर :

हर्ष को अपने दोषों को पहचानना चाहिए और उन्हें दूर करने का निरंतर प्रयास करना चाहिए। सत्संग का उद्देश्य केवल क्रियाएँ करना नहीं, बल्कि स्वभाव और दोषों में सुधार करना भी है। इसलिए उसे आत्मचिंतन करके अपने आध्यात्मिक जीवन को आगे बढ़ाना चाहिए।


प्रश्न :

मनोजभाई एक कार्यालय में काम करते थे। उन्हें बाहर का जंक फूड खाने का बहुत शौक था। प्रतिदिन कार्यालय से घर जाते समय रास्ते में कई फास्ट फूड की दुकानें आती थीं। वहाँ से आने वाली सुगंध उन्हें बहुत आकर्षित करती थी। कई बार वे निश्चय करते कि आज बाहर का कुछ नहीं खाऊँगा, लेकिन जैसे ही खाने की खुशबू आती, उनका निर्णय बदल जाता।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में मनोजभाई को क्या सोचना चाहिए?

ग.प्र.१८ :

"पाँचों इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला आहार यदि शुद्ध होगा तो अंतःकरण भी शुद्ध होगा; और यदि इन्द्रियों का आहार अशुद्ध होगा तो अंतःकरण भी अशुद्ध हो जाएगा।"

उत्तर :

मनोजभाई को समझना चाहिए कि इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किए जाने वाले विषय मन पर प्रभाव डालते हैं। स्वास्थ्य और मन की शुद्धि के लिए इन्द्रियों पर नियंत्रण आवश्यक है। इसलिए केवल स्वाद के पीछे न भागकर उचित और शुद्ध आहार ग्रहण करना चाहिए।


प्रश्न :

पूजा कॉलेज में पढ़ती थी। उसे अपने रूप-रंग की बहुत चिंता रहती थी। सोशल मीडिया पर वह घंटों दूसरों की तस्वीरें देखती और अपनी तुलना उनसे करती। यदि कोई उसकी प्रशंसा करता, तो वह खुश हो जाती, लेकिन यदि कोई उसके रूप के बारे में टिप्पणी कर दे, तो वह पूरे दिन दुःखी रहती।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में पूजा को क्या सोचना चाहिए?

ग.अं.३९ :

"अपने आपको शरीर से अलग आत्मा समझना चाहिए। आत्मा न किसी जाति का है, न किसी संबंध का है; वह तेजस्वी और चेतन स्वरूप है।"

उत्तर :

पूजा को समझना चाहिए कि उसकी वास्तविक पहचान शरीर नहीं, बल्कि आत्मा है। केवल रूप-रंग के आधार पर अपनी कीमत निर्धारित करना उचित नहीं है। आत्मा का मूल्य शरीर से कहीं अधिक है। इसलिए उसे बाहरी रूप की चिंता छोड़कर अपने आध्यात्मिक गुणों और आंतरिक विकास पर ध्यान देना चाहिए।

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પ્રેક્ટિસ ટેસ્ટ - 4 - solution

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