वचनामृत मौखिक प्रश्नोत्तर -Practice Text -4 - Solution

 प्रश्न : मयंक कॉलेज में पढ़ता था। शुरुआत में वह पढ़ाई, सत्संग और परिवार के प्रति जिम्मेदार था। लेकिन कॉलेज में उसकी मित्रता कुछ ऐसे युवकों से हो गई, जो अपना अधिकांश समय घूमने-फिरने, मोबाइल और अनावश्यक मौज-मस्ती में बिताते थे। मयंक के माता-पिता और एक वरिष्ठ संत ने भी उसे इस मित्र मंडली से सावधान रहने के लिए कहा। लेकिन मयंक को लगा कि मैं उनके बीच रहकर भी नहीं बिगड़ूँगा। धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई खराब होने लगी, सत्संग में रुचि कम होने लगी और घर में भी मतभेद बढ़ने लगे। अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि जीवन में इतनी अशांति क्यों आ गई।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में मयंक को क्या सोचना चाहिए?

ग.म.३५ :
"जगत में ऐसी बात प्रचलित है कि ‘मन अच्छा हो तो कठौती में गंगा।’ परंतु यह बात गलत है। कोई कितना भी समाधिनिष्ठ या विचारवान क्यों न हो, यदि वह स्त्रियों के प्रसंग में रहने लगे तो उसका धर्म नहीं टिक सकता। और कोई स्त्री कितनी भी धर्मनिष्ठ क्यों न हो, यदि उसे पुरुष का सहवास मिले तो उसका धर्म भी नहीं टिक सकता। इसलिए ऐसा आशा नहीं रखनी चाहिए कि स्त्री-पुरुष का परस्पर सहवास हो और धर्म बना रहे। इसमें कोई संदेह नहीं रखना चाहिए।"

उत्तर :
मयंक को सोचना चाहिए कि गलत संग का प्रभाव धीरे-धीरे अवश्य पड़ता है। “मैं नहीं बिगड़ूँगा” ऐसा अहंकारपूर्ण विश्वास रखना उचित नहीं है। अध्ययन, सत्संग और सदाचार बनाए रखने के लिए अच्छे संग का आश्रय लेना चाहिए तथा कुसंग से दूर रहना चाहिए।


प्रश्न : नेहा एक निजी कंपनी में काम करती थी। अचानक कंपनी ने कर्मचारियों की संख्या कम करने का निर्णय लिया और उसकी नौकरी चली गई। यह समाचार सुनकर वह बहुत निराश हो गई। शुरुआती कुछ दिनों तक वह अधिकांश समय बिस्तर पर पड़ी रहती। कभी अकेले बैठकर रोती और कभी परिवार के लोगों से चिड़चिड़ेपन से बात करती। उसके मित्र उसे नई नौकरी के लिए आवेदन करने और नए कौशल सीखने के लिए प्रेरित करते, लेकिन उसका किसी काम में मन नहीं लगता था। दिन बीतने के साथ उसकी चिंता और निराशा बढ़ती गई। अब वह उलझन में थी कि इस परिस्थिति से बाहर कैसे निकले।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में नेहा को क्या सोचना चाहिए?

सारं.१८ :
"मूर्ख मनुष्य जब उलझन में पड़ता है तो या तो सोता रहता है, या रोता है, या किसी से झगड़ता है, या उपवास करता है। इस प्रकार वह अपनी उलझन दूर करने का प्रयास करता है। परंतु ऐसा करने से न दुःख दूर होता है और न स्वभाव बदलता है। यदि समझदारी से उपाय करे तो दुःख और स्वभाव दोनों दूर हो जाते हैं। इसलिए समझदार मनुष्य ही सुखी होता है।"

उत्तर :
नेहा को सोचना चाहिए कि रोने, निराश होकर बैठे रहने या चिड़चिड़ेपन से समस्या का समाधान नहीं होगा। उसे धैर्यपूर्वक परिस्थिति का सामना करना चाहिए, नए अवसरों की तलाश करनी चाहिए और भगवान पर विश्वास रखते हुए पुरुषार्थ करना चाहिए।


प्रश्न : मीत 12वीं कक्षा में पढ़ता था। उसकी बोर्ड परीक्षा निकट थी। उसके कुछ मित्र परीक्षा में नकल करने की योजना बना रहे थे। वे मीत को भी अपने साथ शामिल होने के लिए समझा रहे थे। मित्रों का कहना था कि ऐसा करने से अच्छे अंक आ जाएंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा। दूसरी ओर, मीत को भीतर से लग रहा था कि यह सही नहीं है। अब वह दुविधा में था। एक तरफ मित्रों की बात थी और दूसरी तरफ उसकी अंतरात्मा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कौन-सा निर्णय सही है।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में मीत को क्या सोचना चाहिए?

ग.प्र.१६ :
"जिस भगवान के भक्त में सत्-असत् का विवेक होता है, वह अपने अवगुणों को पहचानकर उनका त्याग कर देता है। वह अच्छे विचारों को ग्रहण करता है और बुरे विचारों का त्याग करता है।"

उत्तर :
मीत को सोचना चाहिए कि गलत मार्ग से प्राप्त सफलता वास्तविक सफलता नहीं होती। उसे सत् और असत् का विवेक रखकर गलत कार्य का त्याग करना चाहिए। मित्रों के दबाव में आए बिना सत्य और ईमानदारी का मार्ग अपनाना चाहिए।


प्रश्न : रिद्धि पिछले कुछ महीनों से लगातार व्यस्त रहती थी। दिन की शुरुआत से लेकर रात को सोने तक वह मोबाइल, सोशल मीडिया, वेब सीरीज़, समाचार और विभिन्न प्रकार की जानकारी में ही लगी रहती थी। शुरुआत में उसे लगता था कि यह सब केवल मनोरंजन और जानकारी के लिए है। लेकिन धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि उसका मन लगातार विचारों से भरा रहता है। पूजा के समय एकाग्रता नहीं रहती थी, पढ़ाई में भी ध्यान कम लगता था और छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन आने लगा था। अब उसे लगने लगा कि उसके मन को शांति और स्वच्छता की आवश्यकता है, लेकिन शुरुआत कहाँ से करे यह समझ नहीं आ रहा था।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में रिद्धि को क्या सोचना चाहिए?

ग.प्र.१८ :
"पाँच इन्द्रियों द्वारा जीव जो आहार ग्रहण करता है, यदि वह शुद्ध होगा तो अंतःकरण भी शुद्ध होगा। और अंतःकरण शुद्ध होगा तो भगवान की अखंड स्मृति रहेगी। यदि एक भी इन्द्रिय का आहार मलिन हो जाए तो अंतःकरण भी मलिन हो जाता है। इसलिए भगवान के भजन में जो विघ्न आता है उसका कारण इन्द्रियों के विषय ही हैं।"

उत्तर :
रिद्धि को सोचना चाहिए कि मन की अशांति का एक बड़ा कारण इन्द्रियों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला अशुद्ध विषय-आहार है। उसे मोबाइल, सोशल मीडिया और अनावश्यक सामग्री का उपयोग सीमित करना चाहिए तथा भजन, पूजा, सत्संग और अच्छे विचारों द्वारा अपने मन को शुद्ध बनाना चाहिए।


प्रश्न : मानसी कॉलेज में पढ़ती थी। उसके मन में कई अच्छे विचार और सपने थे, लेकिन हर निर्णय लेने से पहले वह एक ही बात के बारे में अधिक सोचती थी—"लोग क्या कहेंगे?" यदि उसे कोई प्रश्न पूछना होता, तो वह डरती कि लोग उसे कम समझेंगे। यदि किसी नई गतिविधि में भाग लेने का अवसर मिलता, तो वह सोचती कि अगर मैं असफल हो गई तो लोग मेरा मज़ाक उड़ाएँगे। सोशल मीडिया पर फोटो डालना हो या कोई अच्छा निर्णय लेना हो, वह हमेशा दूसरों की राय को लेकर चिंतित रहती थी। धीरे-धीरे वह अपनी इच्छाओं से अधिक लोगों के विचारों के अनुसार जीने लगी।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में मानसी को क्या सोचना चाहिए?

ग.अं.३९ :
"अपने को देह से पृथक आत्मा जानना चाहिए। वह आत्मा न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न किसी का पुत्र है, न किसी का पिता है। उसकी कोई जाति या नात नहीं है। वह आत्मा सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी तथा ज्ञानस्वरूप है।"

उत्तर :
मानसी को सोचना चाहिए कि उसकी वास्तविक पहचान लोगों की राय, रूप या सामाजिक स्वीकृति पर आधारित नहीं है। वह देह नहीं, बल्कि दिव्य आत्मा है। इसलिए उसे लोगों के विचारों से अधिक सत्य, धर्म और अपने कर्तव्य को महत्व देना चाहिए।


प्रश्न : हितेश के क्षेत्र में एक नया युवक सभा में आने लगा। उसे अभी सत्संग की कई बातों की जानकारी नहीं थी। कभी-कभी उससे सभा के नियमों में गलती हो जाती और वह हमेशा उचित व्यवहार भी नहीं कर पाता था। कुछ युवक उसका मज़ाक उड़ाते और उसे कम समझते थे। हितेश भी कभी-कभी सोचता था कि उसे अभी कुछ नहीं आता। लेकिन वह युवक नियमित रूप से सभा में आता, संतों की बातें सुनता और धीरे-धीरे सीखने का प्रयास कर रहा था।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में हितेश को क्या सोचना चाहिए?

ग.प्र.२४ :
"जब किसी हरिभक्त का दोष दिखाई दे, तब ऐसा समझना चाहिए कि उसका स्वभाव भले ही सत्संग के योग्य न लगता हो, फिर भी उसे सत्संग मिला है और वह सत्संग में बना हुआ है, तो अवश्य उसके पूर्व जन्म या इस जन्म के संस्कार श्रेष्ठ हैं। इसलिए उसके गुणों को ग्रहण करना चाहिए।"

उत्तर :
हितेश को सोचना चाहिए कि किसी की कमियाँ देखने के बजाय उसके गुण और सत्संग के प्रति उसकी निष्ठा देखनी चाहिए। नए युवक को प्रोत्साहित करना चाहिए और उसके सीखने के प्रयास की सराहना करनी चाहिए।


प्रश्न : कृणाल एक अच्छी नौकरी करता था और उसकी आवश्यकताएँ भी अच्छी तरह पूरी हो जाती थीं। फिर भी उसके मन में लगातार नई चीज़ें पाने की इच्छा रहती थी। जब कोई मित्र नया मोबाइल खरीदता, तो उसे भी नया मोबाइल चाहिए होता। कोई नई बाइक ले तो उसे भी वही मॉडल लेने की इच्छा होती। सोशल मीडिया पर लोगों की जीवनशैली देखकर वह अपने पास जो है उसमें संतोष अनुभव नहीं कर पाता था। एक इच्छा पूरी होती, तो तुरंत दूसरी इच्छा उत्पन्न हो जाती। धीरे-धीरे वह लगातार तुलना, अपेक्षा और असंतोष में जीने लगा।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में कृणाल को क्या सोचना चाहिए?

ग.म.५५ :
"जैसे काबर के बच्चों में अच्छा कौन और बुरा कौन? सभी एक ही समूह के हैं। उसी प्रकार मायिक पदार्थ भी सभी समान हैं।"

उत्तर :
कृणाल को सोचना चाहिए कि संसार की वस्तुओं की इच्छाओं का अंत नहीं है। एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी उत्पन्न हो जाती है। सच्चा सुख वस्तुओं में नहीं, बल्कि संतोष और भगवान के आश्रय में है। इसलिए तुलना छोड़कर जो प्राप्त है उसमें संतुष्ट रहना चाहिए।


प्रश्न : आकाश एक प्रतिष्ठित कंपनी में काम करता था। लोग उसे उसकी नौकरी, पद और सामाजिक पहचान के आधार पर जानते थे। धीरे-धीरे वह भी अपनी पहचान को इन्हीं बातों से जोड़ने लगा। जब कोई उसकी उपलब्धियों की प्रशंसा करता, तो वह बहुत खुश हो जाता, लेकिन यदि कोई उसे उचित सम्मान न दे, तो उसे बहुत दुःख होता। एक समय नौकरी में बदलाव आने के कारण उसकी जिम्मेदारियाँ कम हो गईं। तब से उसे लगने लगा कि उसकी कीमत भी कम हो गई है। अब वह बार-बार सोचता था कि लोग उसे कैसे देखते हैं और उसकी वास्तविक पहचान क्या है।

प्रश्न : ऐसी परिस्थिति में आकाश को क्या सोचना चाहिए?

ग.अं.३९ :
"अपने को देह से पृथक आत्मा जानना चाहिए। वह आत्मा न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न किसी का पुत्र है, न किसी का पिता है। उसकी कोई जाति या नात नहीं है। वह आत्मा सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी तथा ज्ञानस्वरूप है।"

उत्तर :
आकाश को सोचना चाहिए कि उसकी वास्तविक पहचान नौकरी, पद, प्रतिष्ठा या लोगों की प्रशंसा पर आधारित नहीं है। वह देह से भिन्न, दिव्य और चेतन आत्मा है। इसलिए बाहरी मान-सम्मान के आधार पर अपनी कीमत नहीं आँकनी चाहिए, बल्कि आत्मस्वरूप का विचार करके स्थिरता और शांति प्राप्त करनी चाहिए।

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