प्रवेश - शास्त्रीजी महाराज - – प्रकरण 11 से 15 का सारांश
📕 Chapter – 11
🔹 विस्तृत बिंदु रूप
एक बार प्रागजी भक्त ने उनके सामने लोया प्रकरण का 12वाँ वचनामृत पढ़कर अक्षररूप होकर पुरुषोत्तम भगवान का निश्चय करने की बात समझाई।
वह अक्षर गुणातीतानंद स्वामी हैं और सभी को उनके स्वरूप का होना है।
ब्रह्मवेत्ता संत का योग हो तो अक्षररूप हुआ जाता है और पुरुषोत्तम भगवान का निश्चय होता है।
यह बात यज्ञपुरुषदासजी को समझ में आ गई।
इसके बाद एक दिन सूरत के हरिभक्तों ने विज्ञानानंद स्वामी से पूछा :
“स्वामी! उत्तम निर्विकल्प निश्चय कैसे होता है?”
विज्ञानानंद स्वामी ने उन्हें समझाया।
तब यज्ञपुरुषदास ने कहा कि
“इसका उत्तर तो लोया के 12वें वचनामृत में है।”
यह सुनकर विज्ञानानंद स्वामी बहुत प्रसन्न हुए और कहा कि
प्रागजी भक्त वचनामृत के सभी विषय और श्रीजी महाराज का सिद्धांत जानते हैं।
गुणातीतानंद स्वामी की कृपा से उन्हें ब्रह्मस्थिति सिद्ध हुई है।
श्रीजी महाराज सर्वोपरी भगवान हैं और गुणातीतानंद स्वामी मूल अक्षर हैं —
यह दोनों बातें स्पष्ट हो गईं।
🔹 लास्ट मिनट रिविजन
लोया प्रकरण का 12वाँ वचनामृत अक्षररूप होने और पुरुषोत्तम भगवान के निश्चय की बात समझाता है।
वह अक्षर गुणातीतानंद स्वामी हैं।
उत्तम निर्विकल्प निश्चय का उत्तर लोया के 12वें वचनामृत में है।
श्रीजी महाराज सर्वोपरी भगवान हैं — यह बात स्पष्ट हो गई।
📕 अध्याय – 12
“वह तो मेरा कोडोलो लाल है”
🔹 विस्तृत बिंदु रूप
उस समय प्रागजी भक्त भी वर्ताल पधारे थे।
यज्ञपुरुषदासजी को भगतजी महाराज का समागम प्राप्त हुआ।
भगतजी महाराज की बातें सुनने अनेक स्नेही साधु जाते थे,
परंतु अन्य लोग उपाधि करते थे इसलिए भगतजी महाराज उन्हें उठा देते थे।
पर यज्ञपुरुषदासजी को कभी नहीं उठाते थे।
जब पूछा गया, तब भगतजी महाराज ने कहा :
“वह तो मेरा कोडोलो लाल है।”
इससे भगतजी महाराज का यज्ञपुरुषदासजी पर प्रेम प्रकट हुआ।
यज्ञपुरुषदासजी ने भगतजी महाराज की आज्ञा से
अपनी अमूल्य चरणारविंद की जोड़ी दे दी।
भगतजी महाराज अत्यंत प्रसन्न हुए।
यह निश्चित हुआ कि
आचार्य महाराज शास्त्रविद्या पढ़ाएँगे
और भगतजी महाराज ब्रह्मविद्या पढ़ाएँगे।
🔹 लास्ट मिनट रिविजन
“वह तो मेरा कोडोलो लाल है” — यह वाक्य प्रेम दर्शाता है।
यज्ञपुरुषदासजी ने अमूल्य चरणारविंद अर्पित किए।
संतमंडल ध्यान, भजन और सेवा में लीन रहता था।
इस मंडल की पूरे देश में ख्याति हुई।
📕 अध्याय – 13
गुरु–शिष्य का प्रेम प्रवाह
🔹 विस्तृत बिंदु रूप
रामनवमी के समय जूनागढ़ से जागा भक्त पधारे।
यज्ञपुरुषदासजी ने उनकी सेवा की।
यज्ञपुरुषदासजी ने भगतजी महाराज को
प्रसादी का मोगरे का हार और तुंबड़ी भेंट भेजी।
भगतजी महाराज बहुत प्रसन्न हुए और
यज्ञपुरुषदासजी पर अपना प्रेम प्रकट किया।
वर्ताल में भगतजी महाराज के महिमा की बातें होने लगीं।
इससे कुछ साधुओं में विरोध उत्पन्न हुआ।
भगतजी महाराज ने शिष्यों को
सभा में क्षमा माँगने के लिए कहा।
यज्ञपुरुषदासजी ने सब कुछ सहन किया।
उनकी सहनशीलता से भक्तों में उनका मान बढ़ता गया।
🔹 लास्ट मिनट रिविजन
यज्ञपुरुषदासजी ने गुरु के प्रेम और आज्ञा का पालन किया।
विरोध के बावजूद उन्होंने धैर्य रखा।
गुरु–शिष्य का प्रेम स्पष्ट हुआ।
📕 अध्याय – 14
भगतजी : परम एकान्तिक सत्पुरुष
🔹 विस्तृत बिंदु रूप
वर्ताल का समैया करके यज्ञपुरुषदास, विज्ञानदास आदि संतमंडल गढ़डा से महुवा गया।
महुवा के मंदिर में पुराणी रघुवीरचरणदास ने यज्ञपुरुषदास और पुराणी केशवप्रसाददास को ठहराया।
उन्होंने पूछा :
“प्रागजी भक्त को आप क्या मानते हैं?”
यज्ञपुरुषदासजी ने कहा :
“हम उन्हें परम एकान्तिक मानते हैं।”
सभा में भी यही प्रश्न उठा।
तब कहा गया कि प्रागजी भक्त वचनामृत में बताए गए एकान्तिक सत्पुरुष हैं।
गढ़डा प्रथम प्रकरण के 27वें वचनामृत के अनुसार समझाया गया कि
एकान्तिक पुरुष में धर्म, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के लक्षण होते हैं
और ऐसे संत से श्रीजी महाराज एक क्षण भी दूर नहीं रहते।
वचनामृत के प्रमाणों से
प्रागजी भक्त की साधुता सबको स्पष्ट हो गई।
इससे भगतजी महाराज की परम एकान्तिक स्थिति सबको समझ में आ गई।
यज्ञपुरुषदासजी की शास्त्रीय समझ से
भगतजी महाराज अत्यंत प्रसन्न हुए
और उनके सिर पर हाथ रखा।
🔹 लास्ट मिनट रिविजन
प्रागजी भक्त परम एकान्तिक सत्पुरुष हैं।
एकान्तिक पुरुष में धर्म, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति होती है।
ऐसे संत से श्रीजी महाराज दूर नहीं रहते।
भगतजी महाराज की परम एकान्तिक स्थिति स्पष्ट हुई।
📕 अध्याय – 15
ठाकरिया बिच्छू
🔹 विस्तृत बिंदु रूप
वर्ताल से यज्ञपुरुषदासजी ठासरा गए।
ठासरा में कथा-वार्ता करके हरिभक्तों को बहुत आनंद कराया।
वहाँ से वे डभोई गए।
डभोई में पुराणी मुरलीधरदास को भगतजी के प्रति अभाव था।
यज्ञपुरुषदासजी ने बातचीत करके वह अभाव दूर किया
और भगतजी का महिमा समझाया।
जब यह बात भगतजी महाराज को पता चली तो उन्होंने कहा :
“यज्ञपुरुषदासजी तो ठाकरिया बिच्छू हैं।
वे जहाँ भी जाएँगे,
मुमुक्षु को चटका मारकर
प्रत्यक्ष भगवान और प्रत्यक्ष संत की पहचान कराएँगे।”
डभोई के हरिभक्त यज्ञपुरुषदासजी की बातें सुनकर बहुत आनंदित हुए।
पुराणी मुरलीधरदास ने कहा :
“वाह, वाह, यज्ञपुरुष!
आज आपने जो बातें कीं,
उन्होंने मेरा हृदय ठंडा कर दिया।
मेरी इतनी वृद्ध आयु में
मैंने ऐसी बातें कभी नहीं सुनीं।”
उन्होंने सभा में दंडवत् करना चाहा,
पर यज्ञपुरुषदासजी ने उन्हें रोका।
बाद में वर्ताल में अध्ययन प्रारंभ किया,
पर विद्वान शास्त्री न मिलने से वे वडोदरा गए।
वडोदरा में रंगाचार्य नामक विद्वान शास्त्री के पास
“सिद्धांत कौमुदी” का अध्ययन किया।
यज्ञपुरुषदासजी की बुद्धि और स्मरणशक्ति देखकर
रंगाचार्य को उनके प्रति बहुत मान हुआ।
इससे रंगाचार्य को
भगतजी महाराज के दर्शन की तीव्र इच्छा हुई।
🔹 लास्ट मिनट रिविजन
यज्ञपुरुषदासजी ने अभाव दूर करके भगतजी का महिमा समझाया।
भगतजी महाराज ने उन्हें “ठाकरिया बिच्छू” कहा।
उन्होंने प्रत्यक्ष भगवान और संत की पहचान कराई।
वडोदरा में सिद्धांत कौमुदी का अध्ययन किया।
रंगाचार्य भगतजी महाराज के दर्शन की इच्छा करने लगे।


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